मंगलवार, सितंबर 28, 2010

खजुराहो की मूर्तिकला में गले के आभूषण Ornaments on Khajuraho Icons- Part-1

- डॉ. शरद सिंह
        खजुराहो की मंदिर भित्तियों पर अंकित मूर्तियों में स्पष्ट होता है कि उस काल में दो प्रकार के गले के आभूषण पहने जाते थे-(अ) गुलूबंद (नेकलेस) (ब) हार।

(अ)    गुलूबंद (नेकलेस) - गुलूबंद गले के चारों ओर अर्ध चन्द्राकार आभूषण है, जिसमें पंखुड़ी की आकृतियां, आम्र की आकृतियां बनी रहती थी। बीच की आकृति बड़ी होती थी। तथा उसके दोनों ओर ये आकृतियां छोटी होती चली जाती थी। इनमें तीर की आकृति जैसी तिकौनी अथवा चतुष्परणीय आकृति एक चौकोर टुकड़े में बनी होती थी।
(ब)    हार - यह वक्ष स्थल से होता हुआ नीवि (नाभि) तक आया हुआ होता था। यह इकहरी अथवा तीन लड़ी का भी होता था। वक्ष तक आये हुये हार में चौकोर लाकेट होता था, जो वक्ष के ठीक ऊपर आता था।
        संग्रहालय में रखी एक युगल मूर्ति में उत्कीर्ण गुलूबंद सपाट है। जिसके बीच में उत्खचन है। इसमें तीन लड़ी की माला भी अंकित है। गुलुबंद से निकला हुआ एक लंबा पतला हार पेट पर आया हुआ है।

(स)    पुरूषों का गले के आभूषण - महिलाओं के गुलुबंद तथा हार के समान पुरूषों के गले के आभूषण में भी पंखुरी, कलियां, आम्र, घंटिका अथवा चौकोर आकृति बनी होती थी। इनमें इकहरी दोहरी और तिहरी लड़ भी पायी जाती थी। पुरूष वर्ग हंसुली भी पहनता था। 

गुरुवार, सितंबर 16, 2010

Khajuraho is a mysterious place

Khajuraho is a mysterious place due to his erotic icons on the walls of temples. Think! how it could be possible to exposed sexual illustration on neither a public place nor at worship place. In my vission in that time the social thinking had barrier less span. They were had broad mind. 
      Situated in the heart of Central India, in the state of Madhya Pradesh, Khajuraho is a fascinating village with a quaint rural ambience and a rich cultural heritage. The fascinating temples of Khajuraho, India's unique gift of love to the world, represent the expression of a highly matured civilization.
Khajuraho temples were constructed between 950 and 1050 A.D. during the reign of Chandel Empire. Khajuraho derives its name from the Khajur tree (the date palm tree) which can be found in abundance in the area. These temples are considered the "high point" of Indian architectural genius in the Medieval period.
                  Originally there were 85 temples, of which only 25still exist. The amazingly short span of 100 years, from 950 AD - 1050 AD, saw the completion of all the temples, in an inspired burst of creativity. With the wane of the Chandela empire, these magnificent temples lay neglected, and vulnerable to the ravages of Nature. It was only in this century, that they were rediscovered, restored and granted the recognition that they justly deserve. The murals depict the life and times of the Chandelas, and celebrate the erotic state of being. They not only testify to the mastery of the craftsman, but also to the extraordinary breadth of vision of the Chandela Rajputs under whose reign, these temples were constructed. Their style of architecture was also rather peculiar to their times. Each structure stands on a high masonry platform with a distinct upward direction to their build, further enhanced by several vertical projections to simulate the effect of an overall lightness. The three main compartments are the entrance (ardhamandapa), assembly hall (mandapa), and the actual sanctum (garbha griha). The temples are grouped into three geographical divisions : western, eastern and southern.
           The creators of Khajuraho claimed descent from the moon. The legend that describes the origin of this great dynasty is a fascinating one - Hemavati, the beautiful young daughter of a Brahmin priest was seduced by the moon god while bathing in the Rati one evening. The child born of this union between a mortal and a god was a son, Chandravarman. Harassed by society, the unwed mother sought refuge in the dense forest of Central India where she was both mother and guru to her young son. The boy grew up to found the great Chandela dynasty. When he was established as a ruler, he had a dream-visitation from his mother, who implored him to build temples that would reveal human passions, and in doing so bring about a realization of the emptiness of human desire. Chandravarman began the construction of the first of the temples, successive rulers added to the fast growing complex.
Yet another theory is that the erotica of Khajuraho, and indeed of other temples, had a specific purpose. In those days when boys lived in hermitages, following the Hindu law of being "brahmacharis" until they attained manhood, the only way they could prepare themselves for the worldly role of 'householder' was through the study of these sculptures and the earthly passions they depicted. 
          Think! how it could be possible to exposed sexual illustration on neither a public place nor at worship place. In my visions in that time the social thinking had barrier less span. They were had broad mind. 

गुरुवार, सितंबर 09, 2010

प्राचीन भारत में स्त्री के अधिकार एवं स्वतंत्रता

          किसी भी सभ्य समाज अथवा संस्कृति की अवस्था का सही आकलन उस समाज में स्त्रियों की स्थिति का आकलन कर के ज्ञात किया जा सकता है। विशेष रूप ये पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्रियों की स्थिति सदैव एक-सी नहीं रही। वैदिक युग में स्त्रियों को उच्च शिक्षा पाने का अधिकार था, वे याज्ञिक अनुष्ठानों में पुरुषों की भांति सम्मिलित होती थीं। किन्तु स्मृति काल में स्त्रियों की स्थिति वैदिक युग की भांति नहीं थी। पुत्री के रूप में तथा पत्नी के रूप में स्त्री समाज का अभिन्न भाग रही लेकिन विधवा स्त्री के प्रति समाज का दृष्टिकोण कालानुसार परिवर्तित होता गया।

पुत्री के रूप में
प्राचीन भारतीय समाज में पुत्रियों को भावी स्त्री के रूप में संतति में वृद्धि करने वाली माना जाता था। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें शिक्षा से वंचित रखा जाता रहा हो, पुत्रियों को भी शिक्षा दी जाती थी तथा विदुषी पुत्री को समाज में सराहना मिलती थी। फिर भी विभिन्न युगों में समाज में पुत्री की स्थिति में अन्तर आता गया।

सैन्धव काल में - सिन्धु घाटी सभ्यता में पुत्रियों की स्थिति का अनुमान स्त्रियों के आभूषण, देवी भगवती की मूर्ति तथा नर्त्तकी की मूर्ति से लगाया जा सकता है। सैन्धव समाज में जननी की भूमिका निभाने वाली स्त्री का विशेष स्थान था। अतः पुत्रियों के जन्म को भी सहर्ष स्वीकार किया जाता रहा होगा। उन्हें शिक्षा दी जाती थी तथा नृत्य, गायन, वादन आदि विभिन्न कलाओं में निपुणता प्राप्त करने का अवसर दिया जाता था।

वैदिक युग में -वैदिक युग में स्त्री का समाज में पुरुषों के समान सम्मान था। पुरुष सत्तात्मक समाज में पुत्र के जन्म की कामना सदैव रही है। पुत्रों को युद्ध में षत्रुओं को पराजित करने के लिए योग्य माना जाता था। इसी भावना के कारण वैदिक युग में भी कुछ ऐसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते थे जो पुत्र जन्म से संबंधित होते थे। अथर्ववेद में इसी प्रकार के एक धार्मिक अनुष्ठान का उल्लेख मिलता है जो पुत्र प्राप्ति की कामना से किया जाता था। किन्तु वैदिक ग्रंथों में ही कुछ ऐसे अनुष्ठानों का भी उल्लेख है जो पुत्री प्राप्त करने की लालसा से किए जाते थे। बृहदारण्यक उपनिषद् में इसी प्रकार के एक अनुष्ठान का उल्लेख है जो विदुषी पुत्री प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता था।
             वैदिक युग में पुत्री के जन्म पर शोक मनाने का उल्लेख किसी भी वैदिक ग्रंथ में नहीं मिलता है। ऋग्वैदिक काल में लोपामुद्रा, घोषा, निवावरी, सिकता, विश्ववारा आदि अनेक ऐसी स्त्रियां हुईं जिन्होंने ऋचाएं लिख कर ऋग्वेद को समृद्ध किया। वैदिक युग में पुत्रियों के लिए योग्य वर मिलना कठिन नहीं था। स्त्रियों को नियोग एवं पुनर्विवाह की भी अनुमति थी अतः माता-पिता के लिए पुत्री का जन्म चिन्ता का विषय नहीं होता था। पुत्रियों को इच्छानुसार शिक्षा पाने का अधिकार था। वे ज्ञान प्राप्त करती हुई एकाकी जीवन भी व्यतीत कर सकती थीं। उन्हें युवा होने पर अपनी इच्छानुसार वर चुनने का भी अधिकार था।
उत्तरवैदिक युग में
उत्तरवैदिक युग में पुत्रियों की स्थिति ठीक वैसी नहीं रही जैसी कि वैदिक युग में थी। उत्तरवैदिक काल में यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान करने का अधिकार पुत्रों को दिया गया। पुत्रियां यज्ञ में सहभागी हो सकती थीं किन्तु यज्ञ नहीं कर सकती थीं। पुत्रियों को भी आश्रम व्यवस्था का पालन करना होता था। अथर्ववेद के अनुसार पुत्रियां लगभग 16 वर्ष की आयु तक अविवाहित रहती थीं। 16 वर्ष की आयु पूर्ण कर लेने पर पुत्रों की भांति पुत्रियों का भी उपनयन संस्कार कराया जाता था। उन्हें ब्रह्मचर्य का भी पालन करना होता था। अविवाहित पुत्रियां अपने माता-पिता के संरक्षण में उन्हीं के गृह में रहती थीं। पुत्रों के जन्म पर पुत्रियों के जन्म की अपेक्षा कहीं अधिक खुशी मनाई जाती थी तथा ‘पुत्रवती भव’ का आशीर्वाद पूरा होने की कामना की जाती थी। किन्तु पुत्र के स्थान पर पुत्री का जन्म हो जाने पर उसकी उपेक्षा नहीं की जाती थी। पुत्री के लालन-पालन पर भी पूरा ध्यान दिया जाता था तथा उसे शिक्षित होने का अधिकार था। उत्तरवैदिक काल में धीरे-धीरे उन विचारों का जन्म हुआ जिनमें पुत्री के जन्म को अशुभ घटना माना जाने लगा.

उपनिषद् युग में -
उपनिषद् युग में पुत्रियों को ज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त स्वतंत्रता थी। वे वेदों का अध्ययन कर सकती थीं। वे वेद तथा तत्व-ज्ञान संबंधी विषयों पर पुरुषों के साथ शास्त्रार्थ अर्थात् वाद-विवाद कर सकती थीं। पुरुष के जीवन को स्त्री के बिना अपूर्ण समझा जाता था। अतः पुत्री के जन्म को शोक का कारण नहीं समझा जाता था। पुत्रियों को विवाह के उपरान्त अधिक अधिकार प्राप्त होते थे। विवाह के पूर्व उन्हें अपने माता-पिता के पूर्ण संरक्षण में रहना होता था। विदुषी पुत्रियां समाज में विशेष सम्मान पाती थीं।

(इस आलेख को विस्तार से मेरी पुस्तक ‘प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास’ में पढ़ें।)

बुधवार, सितंबर 08, 2010


        - Dr. (Miss) SHARAD SINGH

          Literacy means knowability of all things that is related with the social life. So, in that mean H-literacy is basically essential for everyone. H-literacy means literacy about History and Heritage. The Archeological department has protected the relics in the state or the country level. Though, it is not sufficient. Because they survey, finding, notifying and took under protection. But there are many places where has been one or two watch-man to the big area. So, now we should have a new and more effective style of protection to our History and Heritage.       
         Though, the debate is going on about History in these days. Well, generally we thought that it may be purely political matter and not having concern of common people but we can never deny every thing in this way. If we lost our awareness about our past definitely we will loose our present as well as our future. Actually the question is not that who was sacrifice during the freedom fight? The question is what is our morality to the past, which that we are under the debate? There are few questions that firstly how much have we respect to our past mean our history? Secondly; how much has we proud to our past? Thirdly; what is the way to present to our view about our affection with the past? By the summarized all of these questions that what is our behavior about the heritage in the general life?
       Firstly; we should think that what is our view about our heritage? Are we taken like our wealth? Are we taken like our property? Are we taken like proud? Or, are we taken like wastes?     
       We have a rich culture through the ancient time. We have a rich heritage in our country. There are several monuments; caves, forts, temple, monastery, tombs, rock-shelters etc. We have a big treasure of ancient art and sculpture. But it is bad to think that when we were visiting these places we never noticed our behavior. We touch the precious piece of monument, we scratch them, plug them and try to ruin by the different way. We carve our name on the same. Most of the people protect the icons by the religious point of view but some are smuggled them for money. The people who are protected as a God’s idol they are also damaged them unwittingly. They are uses milk, oil, water and other chemicals on the idol. They touché and rub them regularly. They pay respect by this manner even though they damaged the antique. They have never thought that the idol can be an invaluable relic. They are never took them as a historical object. In an incident there was a washerman had washes clothes on a stone slab. One day an archeologist had saw that stone slab. He amazed to saw that the stone slab was not ordinary, that was the inscription slab. That was the precious piece of relic. Well, it happens only by the illiteracy but the people which are literate also damaged the relics. They treated like a destroyer. They stolen by cut-off icons from the temples and smuggled them in abroad. Some times they were trapped and punished by the law.
        Some people damaged their heritage in other way. They scratch and carve their name and love symbol (plus, minus, heart etc.) on the historical object. There is lot of temple-walls, icons who damaged. There were mosaic of monument’s floors, walls and ceilings are scraped-off by the visitors. How to do that they are? Actually, they do not know the importance of their history and heritage. So, it is necessary that the literacy of history and heritage should be spread among every people and by this manages the behavior.
        Leave the duel on the subject of history should be attention to prevent the causes of peril on history and heritage. The basic methods of protection of monuments and relics are should be put in the syllabus of school and collage. Should given be the knowledge about history and heritage to the general public by the arrange seminars, workshops, posters, pamphlet and by the volunteer works. Remember! Any archeologist or historian can not be protects to ‘H’, without the hands of general public.