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शुक्रवार, नवंबर 26, 2010

खजुराहो की नदी देवियां

- डॉ. शरद सिंह
         गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों को मानवाकृति में प्रदर्शित करने की परम्परा गुप्त काल में फूली- फली। आरम्भ में द्वार के दोनों ओर मकर वाहिनी गंगा की मूर्ति एक ही रूप में बनाई जाती थी  गंगा की मूर्ति की बनावट में विशेषता यह रहती थी कि गंगा फलयुक्त आम्रवक्ष की डाली पकड़े हुए अपने एक हाथ में घट लिये दिखाई दी जाती थी। कालान्तर में द्वार के दोनों ओर मकरवाहिनी गंगा और कूर्मवाहिनी यमुना अंकित की जाने लगी। इसके उदाहरण गुप्तकाल के अनेक मंदिरों के द्वार पर उत्खचित है। वस्तुतः आरम्भ में इस प्रकार की नदी देवियों की मूर्तियों प्रायः ही बनाई जाती थीं किन्तु चंदेल काल तक देवताओं के मंदिर प्रवेश द्वारों पर नदी देवियों को उकेरा जाने लगा।
    खजुराहो में ब्रह्मा मंदिर के प्रवेश द्वार-शाखाओं के नीचे एक ओर गंगा और दूसरी ओर यमुना का चित्रण है। इसके अतिरिक्त प्रवेश द्वार में और कोई चित्रण नहीं है।
    जगदम्बा मंदिर तथा चित्रागुप्त मंदिरों में भी मकर वाहिनी नदी देवी गंगा की एक-एक मूर्ति प्रदर्शित है।  
     सरस्वती को वीणा बजाते हुए प्रदर्शित किया गया है।
    कन्दरिया महादेव मंदिर के गर्भगृह द्वार पर अंकित सप्त-शाखाओं के नीचे एक ओर मकरवाहिनी गंगा तथा दूसरी कूर्मवाहिनी यमुना की मूर्तियां हैं। इसी प्रकार विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह द्वार पर भी द्वार शाखाओं के नीचे वाहन सहित गंगा और यमुना अंकित हैं।
    मकर वाहिनी गंगा और कूर्मवाहिनी यमुना द्विभुजी हैं। गंगा के हाथों में चंवर तथा कमल और यमुना के हाथों में चंवर तथा नीलोत्पल प्रदर्शित हैं। गंगा और यमुना दोनों ही कर्णाभूषण, हार, गै्रयेवक, बाजूबंद, करधनी तथा पैंजनी से अलंकृत हैं।
     
    वाराह मंदिर की मुख्य प्रतिमा में वाराह के विशालकाय शरीर पर भी गंगा यमुना उत्खचित हैं।