पृष्ठ

बुधवार, अप्रैल 27, 2011

प्राचीन भारत में स्त्रियों के प्रति समाज का दृष्टिकोणः भाग-पांच

- डॉ. शरद सिंह

    चंदेल काल की सबसे बड़ी उपलब्धि है खजुराहो के मंदिर। ये मंदिर  चंदेल कालीन स्त्रियों की स्थिति पर समुचित प्रकाश डालते हैं। इनका निर्माण सन 950 ईस्वी से 1250 ईस्वी के मध्य किया गया। यही काल चंदेलकाल माना गया है 

     1- तत्कालीन स्त्रियों को गायन वादन और नृत्य कला को सीखने की पूरी छूट थी। खजुराहो के वामन मंदिर में एक स्त्री को लम्बा इकतारा बजाती हुई उत्कीर्ण किया गया है। वहीं विश्वनाथ मंदिर में बांसुरी बजाती हुई स्त्री का सुंदर शिल्पांकन है।

     2- चंदेलकालीन स्त्री को पढ़ने-लिखने का अधिकार था। इसके प्रमाण प्रतिमाओं में मिलते हैं । खजुराहो की मूर्तियों में पत्र पढ़कर चिन्तन में डूबी हुई स्त्री उदासी से ग्रस्त आंसू पोंछती हुई आंखें बंद किए अथवा सप्रयास पत्र देखती हुई स्त्री का अत्यंत भावपूर्ण तथा कलात्मक अंकन है। एक स्त्री बायां हाथ अपने वक्ष पर रखी और दायें हाथ में पत्र रखी हुई अंकित है। मानों वह पत्र पढ़ने के लिए अपना हाथ अपने वक्ष के मध्य रखी हुई हो। एक अन्य स्त्री दायें हाथ में कलम तथा बायें हाथ में पुस्तक थामी हुई दर्शाई गई है। खजुराहो के विश्वनाथ मंदिर में एक स्त्री को कागजों के पुलन्दे सहित दिखाया गया है। वह सामने खड़े पुरुष को कुछ समझा रही है। इसी मंदिर के अन्य दृश्य में एक स्त्री पुस्तक रख कर गुरु से पढ़ती हुई दिखाई गई है। अपने बायें हाथ में पत्र तथा दायें हाथ में कलम पकड़कर पत्र लिखती हुई स्त्री प्रतिमा का एक से अधिक मंदिरों में सुन्दर अंकन है। इस मुद्रा में वह सोचती हुई दर्शाई गई है कि पत्र में क्या लिखना है।


      3- खजुराहो मूर्तिकला में कई ऐसे दृश्य हैं जो सिद्ध करते है कि तत्कालीन स्त्रियों में शस्त्र विद्या के प्रति अभिरूचि थी। आत्मरक्षा एवं शिकार के उद्देश्य से वे शस्त्र धारण करती थी। कंदरिया महादेव एवं जगदम्बा मंदिर के आधार फलक पर एक स्त्री को ऐसा भाला रखे हुये दिखाया गया है जिसके एक सिरे पर तीन पत्तियों के आधार का धारदार चाकू जुड़ा हुआ है। वामन मंदिर में एक स्त्री को परशु धारण  किये हुये तथा एक अन्य स्त्री को धनुषबाण सहित प्रदर्शित किया गया है। इस स्त्री के बायें हाथ में धनुष है। जिस पर दायें हाथ से उसने धनुष पर तीर चढ़ाया हुआ है। तथा वह तीर छोड़ने को तत्पर है। उसके कंधे पर तरकश बंधा हुआ है। जिसमें कुछ अन्य तीर रखे हुये है।  दूलादेव मंदिर में एक स्त्री हाथ में चाकू लेकर आक्रमण करने को तत्पर दिखायी गयी है। एक अन्य प्रतिमा में एक स्त्री को बड़ी तलवार थामे हुये दिखाया गया है। अपने दायें हाथ से उसने तलवार की नोंक पकड़ रखी है।



       4- खजुराहो की मंदिर भित्तियों पर गोष्ठी एवं मंत्रणा के कई दृश्य अंकित हैं। जिनसे पता चलता है कि गोष्ठी एवं मंत्रणाओं में स्त्री और पुरूषों दोनों की सहभागिता होती थी। 



      5- खजुराहो की मंदिर भित्तियों के कुछ दृश्यों में स्त्रियों को गेंद खेलते दिखाया गया है। लक्ष्मण मंदिर में एक स्त्री दायें हाथ से बायें हाथ में गेंद उछाल रही है। वह पीछे की ओर से गेंद उछालने के प्रयास में है। इसी प्रकार के दृश्य जगदम्बा मंदिर  लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया महादेव मंदिर की भित्तियों पर भी है। इनमें एक दृश्य ऐसा भी है जिसमें एक स्त्री एक छोटे बालक के साथ है। वह बालक उसके पैरों के पास बैठकर गेंद लपकने को तत्पर है।



      6- चंदेलकाल में स्त्रियों को चित्रकला में अभिरुचि संवारने का पर्याप्त अवसर दिया गया। खजुराहो मंदिर भित्ति पर एक स्त्री को दर्शकों की ओर पीठ कर के दायें हाथ से चित्र बनाती हुई दर्शाया गया है। उसका दायां हाथ सिर ऊपर उठा हुआ है। एक अन्य दृश्य में एक स्त्री दर्शकों की ओर पीठ कर के दीवार पर चित्र बना रही है। इस दृश्य में उस स्त्री के द्वारा बनाए गए वृक्ष की शाखाएं भी स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। पार्श्वनाथ मंदिर में अपने बायें हाथ में रंगों का पात्र लिए तथा दायें हाथ से चित्रा बनाती हुई स्त्री प्रतिमा है।

             
     7- इस काल में स्त्रियों को सज-संवर कर सार्वजनिक उत्सवों में शामिल होने का अधिकार था। सौंदर्य प्रसाधनों में पाउडर (मुखचूर्ण), लिपिस्टिक (अधरराग), काजल, सिंदूर, इत्र आदि का प्रचलन था। भांति-भांति की हेयरस्टाईल्स (केशसज्जा) की जाती थी।
       स्मृतिकाल से निरन्तर कम होते जा रहे अधिकारों की अपेक्षा चंदेलकालीन समाज में स्त्रियों को अधिक सम्मान तथा अधिकार प्राप्त था। इसका एक कारण जो मैंने अपने शोधकार्य के दौरान अनुभव किया कि चंदेल समाज पर स्मृतियों का नहीं बल्कि वेदों और पुराणों के उन तत्वों का प्रभाव था जो समाज को एक वृहद सुलझा हुआ दृष्टिकोण देते हैं। ये तत्व थे - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।


संदर्भः-



                      








-----------------------------------------------------------------



खजुराहो  से संबंधित मेरे द्वारा लिखा गया नाटक नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है-



-------------------------------------------------------------------------

रविवार, अप्रैल 17, 2011

प्राचीन भारत में स्त्रियों के प्रति समाज का दृष्टिकोणः भाग-चार

- डॉ. शरद सिंह


          गुप्तोत्तर काल

     गुप्तोत्तर काल में 12-13 वीं शती तक स्त्रियों की स्थिति में तेजी से गिरावट आई। इस समय परस्पर दो विपरीत स्थितियां मौजूद थीं। एक ओर चंदेल राजवंश था जिसमें स्त्रियों के सामाजिक अधिकार बहुप्रतिशत थे जबकि दूसरी ओर राजपूत राजवंशों में स्त्रियों के सामाजिक अधिकारों में तेजी से कटौती होती जा रही थी। फिर भी 11वीं-12वीं शती तक स्वयंवर द्वारा पति चुनने का अधिकार राजवंश की स्त्रियों को था, कालान्तर में वह भी छिन गया।
1-     गुप्तोत्तर काल में ही राजपूतों में पर्दा प्रथा आरंभ हुई  जिसका प्रभाव अन्य द्विज जातियों पर भी पड़ा था। इस प्रथा ने स्त्रियों के अधिकारों को अत्यंत सीमित कर दिया। स्रियों की मर्यादाएं निश्चित कर दी गई।  

2-   बहुविवाह प्रथा तथा रखैल रखने की प्रथा यथावत जारी रही।
3-     बांझ स्रियों को अपने परिवार में तथा समाज में घोर प्रताड़ना सहन करनी पड़ती थी। ऐसी स्रियों को पारिवारिक एवं सामाजिक अवहेलना का शिकार होना पड़ता था।  

4-   कन्या का जन्म अभिशाप माना जाने लगा और कन्या-शिशु को जन्म लेते ही मार देने की निकृष्ट एवं अमानवीय प्रवृति ने समाज में अपनी जड़ें जमा लीं।

5-     विधवाओं पर अनेक तरह के सामाजिक नियम लाद दिए गए। वे श्रृंगार नहीं कर सकती थीं तथा काले या सफ़ेद कपड़े ही पहन सकती थीं। विधवाओं को सन्यास- व्रत के कठोर नियमों का पालन करना पड़ता था।

देवी पूज्य थी, स्त्री
6-   दासी प्रथा यथावत जारी रही।
दासियां वंशानुगत रुप से सेवकों के रुप में अपने स्वामी की सेवा करती थीं। ये दासियां अपने स्वामी की आज्ञा के बिना विवाह नहीं कर सकती थीं। जब कोई दासी विवाह योग्य हो जाती, तो उसे उसके स्वामी के समक्ष उपस्थित होना पड़ता। यदि उसके स्वामी को वह दासी पसंद आ जाती, तो उसका स्वामी उस दासी का विवाह किसी और दास के साथ करा कर दासी को अपनी वासनापूर्ति के लिए रख लेता। इससे दासी के बच्चों को दास का नाम पिता के रूप में मिलता, भले ही वे स्वामी की संतान होते। ये संतानें वंशानुगत दास मानी जातीं।    

देवीः भौरमदेव (छत्तीसगढ़)
       7-     वेश्याओं द्वारा युवा लड़कियों से अनैतिक कार्य कराने के लिए स्त्रियों का क्रय- विक्रय बढ़ गया। वेश्यावृत्ति बढ़ गई।

         8-     स्त्रियों को पूरी तरह से दोयम दर्जे का समझा जाने लगा।

गुप्तोत्तर काल में एक भयावह प्रथा को बढ़ावा मिला, वह थी- जौहर प्रथा। पराजित राजाओं की रानियां एवं दासियां शत्रुओं से बचने के लिए आग में जीवित जल कर आत्महत्या करने लगीं। कई स्त्रियां सामूहिक रूप से भी जौहर करती थीं। इस कुप्रथा को भरपूर महिमामंडित किया जाने लगा।


सती का पंजा (राजस्थ
9-  जौहर प्रथा की भांति सती-प्रथा गुप्तोत्तर काल में तेजी से बढ़ी। जौहर करने वाली स्त्रियों को ‘सती-देवी’ का दर्जा दिया गया ताकि इस  कुप्रथा को बढ़ावा मिले। जौहर करने वाली और सती होने वाली स्त्रियों की स्मृति में चांद, सूरज और हाथ के पंजे बना कर पूजा की जाने लगी।   

10-स्त्रियों की राजनीतिक भागीदारी लगभग समाप्त हो गई।



चंदेल काल में स्त्रियों के सामाजिक अधिकारों की स्थिति अपेक्षाकृत भिन्न थी जिस पर चर्चा अगली कड़ी में रहेगी।

रविवार, अप्रैल 10, 2011

प्राचीन भारत में स्त्रियों के प्रति समाज का दृष्टिकोणः भाग-तीन

- डॉ. शरद सिंह
  
           गुप्त काल  
गुप्त काल में स्त्रियों की सामाजिक दशा में पहले की अपेक्षा गिरावट आई फिर भी अनेक मामलों में समाज का दृष्टिकोण सकारात्मक था।
  • इस काल में स्त्रियों के सामाजिक अधिकारों में कटौती कर की गई किन्तु फ़ाह्यान एवं ह्वेनसांग के अनुसार इस समय पर्दा प्रथा प्रचलन में नहीं थी।
  • यदि किसी स्त्री का अपहरण कर लिया जाता तो उन्हें पुनः सामाजिक सम्मान नहीं मिलता था। किन्तु उन्हें प्रायश्चित अनुष्ठान के बाद पति एवं परिवार द्वारा स्वीकार कर लिया जाता था।
  • नारद एवं पाराशर स्मृति में 'विधवा विवाह' के प्रति समर्थन जताया गया है।जिससे स्पष्ट होता है कि गुप्त काल में विधवा विवाह का चलन था।
गुप्तकालीन नारी प्रतिमा-मथुरा संग्रहालय
  • मनु के अनुसार जिस स्त्री को पति ने छोड़ दिया हो या जो विधवा हो गई हो, यदि वह अपनी इच्छा से दूसरा विवाह करें तो उसे 'पुनर्भू' तथा उसकी संतान को 'पनौर्भव' कहा जाता था।
  • गुप्तकालीन समाज में वेश्याओं के अस्तित्व के भी प्रमाण मिलते हैं। यद्यपि समाज में वेश्यावृति को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। गुप्त काल में वेश्यावृति करने वाली स्त्रियों को गणिकाकहा जाता था। जो वृद्ध हो जाती थी उन वेश्याओं को कुट्टनीकहा जाता था ।कुट्टनी अथवा ‘कुटनी’ वेश्याओं एवं ग्राहकों के मध्य दलाली का कार्य करती थी। ये विलासी धनिकों के लिए युवतियों को बहलाती-फुसलाती थीं।
  • ‘मेघदूत’ मेंउज्जयिनीके महाकाल मंदिर में देवदासियों के होने वर्णन मिलता है।   
  • गुप्त काल में स्त्रियों को अचल सम्पत्ति पाने का अधिकार था। कात्यायन ने स्त्री को अचल सम्पत्ति की स्वामिनी माना। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार पुत्र के अभाव में पुरुष की सम्पत्ति पर उसकी पत्नी का प्रथम अधिकार होता था। याज्ञवल्क्य, बृहस्पति और विष्णु ने भी संतानविहीन पति के मरने पर विधवा पत्नी को उसका उत्तराधिकारी माना।   
गुप्तकालीन सिक्के में कुमारदेवी और चन्द्र गुप्त
  • गुप्त काल में रानियों को तत्कालीन सिक्कों में बराबरी से स्थान दिया गया। चन्द्र गुप्त ने लिच्छवी राजवंश की राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया था। चन्द्र गुप्त कालीन सिक्कों में कुमारदेवी और चन्द्र गुप्त दोनों को बराबरी से स्थान दिया गया है।  
  • विज्ञानेश्वर के अनुसार स्त्रियों केस्त्रीधनपर प्रथम अधिकार उसकी पुत्रियों का होता था। स्त्रियों की सम्पत्ति के अधिकार पर सर्वाधिक व्याख्यायाज्ञवल्क्य ने दी है। याज्ञवल्क्य एवं बृहस्पति ने स्त्री को पति की सम्पत्ति का उत्तराधिकारिणी माना है।
  • इस समय उच्च वर्ग की कुछ स्त्रियों के विदुषी और कलाकार होने का उल्लेख मिलता है।‘अभिज्ञान शकुन्तलम्’ में अनुसूया को इतिहास का ज्ञाता बताया गया है।मालवी माधव’ में मालती कोचित्रकलामें निपुण बताया गया है।
  • ‘अमरकोष’ में स्त्री शिक्षा के लिए 'आचार्या', 'उपाध्यया' जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।

रविवार, अप्रैल 03, 2011

प्राचीन भारत में स्त्रियों के प्रति समाज का दृष्टिकोणः भाग-दो

  - डॉ. शरद सिंह 

बौद्ध तथा जैन काल
मायादेवी- अजन्ता
बौद्ध तथा जैन युग में भी समाज में स्त्रियों को सम्मान दिया जाता था। यद्यपि इस युग में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों की अपेक्षा निम्न हो चली थी।  बौद्ध ग्रंथों से ज्ञात होता है कि सास-ससुर के अभाव में ही पत्नी को परिवार की स्वामिनी माना जाता था। अशोक के अभिलेख से ज्ञात होता है कि जब किसी परिवार में कोई व्यक्ति रोगग्रस्त होता था, तब पुत्र और पुत्रियों के विवाह संस्कार या पुत्र जन्म के समय स्त्रियां अनेक मंगलिक, धार्मिक क्रियाएं करती थी।
बौद्ध काल में बौद्ध संघ में कुछ विदुषी स्त्रियों के होने का उल्लेख मिलता है। यद्यपि स्त्रियों के लिए संघ के नियम कठोर थे, फिर भी ज्ञान प्राप्ति के लिए अनेक स्त्रियां संघ की शरण जाती थीं और संघ द्वारा उन्हें स्वीकार किया जाता था।
चंदनबाला
     जैन काल में भी स्त्रियों को सम्मान दिया जाता था किन्तु स्त्रियों के लिए नियम कठोर थे। उनसे नियमपूर्वक धर्मपालन की अपेक्षा की जाती थी। ‘चंदनबाला की कथा’ तत्कालीन समाज में स्त्रियों की दशा से बखूबी परिचित कराती है। इस काल में स्त्रियां परिवार और परिवार के पुरुष सदस्यों के प्रति उत्तरदायी होती थीं। यद्यपि उन्हें शिक्षा पाने का अधिकार था, धर्म ग्रंथों को पढ़ने का अधिकार था।
      दिगम्बर जैन सिद्धांतों के अनुसार भी स्त्रियां मुनित्व को प्राप्त नहीं कर सकती थीं।  
   
स्मृति तथा सूत्रकाल
माता-पुत्र..शुंगकाल 2-1 ईसापूर्व
         समाज में विवाहित स्त्री तथा माता को सम्मान दिया जाता था। मनु के अनुसार समाज में माता की प्रतिष्ठा उपाध्याय, आचार्य और पिता से भी अधिक होनी चाहिए। स्मृतिकारों का भी यही मत था कि यदि कोई पुरुष बलात् किसी स्त्री से संभोग कर ले तो उसके पति को उसे छोड़ना नहीं चाहिए। उस स्त्री के प्रायश्चित करने पर पति को उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए। बृहस्पति का मत था कि यदि शत्रु बलात् किसी स्त्री से संभोग कर ले तो उस स्त्री का परित्याग नहीं करना चाहिए। पति को चाहिए कि वह उस स्त्री से प्रायश्चित करा कर उसे वापस स्वीकार कर ले। अत्रि के अनुसार यदि कोई स्त्री किसी अन्य पुरुष के सहवास के कारण गर्भवती हो जाए तो जब बालक का जन्म हो जाए तब उसका पति उस बालक को किसी अन्य व्यक्ति को दे दे और प्रायश्चित करने पर उस स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर ले। स्मृति काल की भांति सूत्रकाल में माता तथा विवाहित स्त्री को समाज में पर्याप्त सम्मान प्राप्त था किन्तु विधवा के लिए कठोर जीवन व्यतीत करने का विधान था।
स्मृतिकालीन वधु-सज्जा
          विवाह के बारे में स्मृतियों में कहा गया कि माँ-बाप को अपनी लड़कियों का विवाह छः और आठ वर्ष से बीच की आयु, अर्थात यौवनारम्भ, के पहले ही कर देना चाहिए। पति द्वारा के त्याग, उसकी मृत्यु, उसके द्वारा सन्यास ग्रहण, समाज द्वारा बहिष्कार तथा उसके नपुंसक होने जैसी कुछ विशेष स्थितियों में स्त्री को पुनर्विवाह की स्वीकृति थी। आम तौर पर औरतों को भरोसे लायक नहीं समझा जाता था। उनको अलग कर रखा जाता था और उन परिवार के पुरुष सदस्यों, पिता, भाई, पति, पुत्र आदि का नियंत्रण रहता था। लेकिन घर के अन्दर उनको आदर अवश्य ही दिया जाता था। यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी का त्याग करता था तो भले ही वह दोषी क्यों न हो, उसे पत्नी को रहन-सहन का खर्चा देना ही पड़ता था। भूमि पर व्यक्तिगत अधिकारों के बढ़ने के साथ स्त्री के सम्पत्ति-अधिकार भी बढ़ते गए। परिवार की सम्पत्ति को बनाए रखने के लिए स्त्री को पुरुष सदस्य की सम्पत्ति के अधिकार भी दिए गए। यदि बिना पुत्र प्राप्ति के किसी पुरुष की मृत्यु हो जाती थी तो कुछ मामलों में छोड़कर उसकी पत्नी को अपने पति की सारी जायदाद का अधिकार मिल जाता था। किसी विधवा की सम्पत्ति पर उसकी लड़कियों का अधिकार भी हो सकता था।