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रविवार, फ़रवरी 10, 2013

भीम कुण्ड : जहां विष्णु तरल रूप में हैं




- डॉ.सुश्री शरद सिंह

सुरम्य प्राकृतिक स्थलों में देवताओं का वास होता है. एक ऐसा ही सिद्ध क्षेत्रा तीर्थ स्थल है भीम कुण्ड. विश्व प्रसिद्ध कलातीर्थ खजुराहो से लगभग 128 कि.मी. दूर स्थित भीम कुण्ड आदिकाल से ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों एवं साधकों के आकर्षण का केन्द्र रहा है. वर्तमान समय में यह धार्मिक-पर्यटन एवं वैज्ञानिक शोध का केन्द्र भी बनता जा रहा है. यहां स्थित जल-कुण्ड भू-वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय रहा है. अनेक शोधकर्ता इस जलकुण्ड में कई बार गोताखोर उतार चुके हैं किन्तु इस जलकुण्ड की थाह आज तक कोई भी नहीं पा सका है.

 पौराणिक ग्रंथों में भीम कुण्ड का नारद कुण्ड तथा नील कुण्ड के नाम से भी उल्लेख मिलता है. भीम कुण्ड के संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं. जिनमें से प्रमुख हैं- देवर्षि नारद द्वारा साम गान का गायन तथा  भीम द्वारा गदा प्रहार द्वारा जल स्रोत प्रकट करना.

देवर्षि नारद द्वारा साम गान का गायन - पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवर्षि नारद आकाश मार्ग से विचरण कर रहे थे. रास्ते में उन्हें अनेक विकलांग स्त्री-पुरुष दिखाई पड़े. वे स्त्री-पुरुष न केवल विकलांग थे अपितु घायल भी थे तथा कराह रहे थे. यह दृश्य देख कर देवर्षि नारद दुखी हो गए. वे उन स्त्री-पुरुषों के पास पहुंचे और उन्होंने उनसे उनका परिचय पूछा. उन स्त्री-पुरुषों ने बताया कि वे संगीत की राग-रागिनियां हैं. यह सुन कर देवर्षि नारद को बहुत आश्चर्य हुआ. उन्होंने राग-रागिनियों से पूछा कि तुम लोगों की ये दशा कैसे हुई बताओ तथा तुम्हारे दुख-कष्ट को दूर करने के लिए मैं क्या कर सकता हूं, यह भी बताओ. देवर्षि नारद के पूछने पर राग-रागिनियों ने बताया कि पृथ्वी पर स्थित अनाड़ी गायक-गायिकाओं द्वारा दोषपूर्ण गायन के कारण हमारे अस्तित्व को क्षति पहुंची है. अब तो हमारा उद्धार तभी हो सकता है जब संगीत विद्या में निपुण कोई कुशल गायक साम गान का गायन करे.
देवर्षि नारद साम गान के ज्ञाता थे. राग-रागिनियों की बात सुन कर वे स्वयं को रोक नहीं सके और उन्होंने साम गान का गायन प्रारम्भ कर दिया. देवर्षि नारद का स्वर तीनों लोकों में व्याप्त होने लगा. देवता साम गान के स्वरों में मग्न होने लगे. भगवान शिव नर्तन कर उठे तथा भगवान ब्रह्मा ताल देने लगे. साम गान के स्वरों को सुन कर तथा इस अलौकिक दृश्य को देख कर भगवान विष्णु इतने भावविभोर हो उठे कि वे द्रवीभूत हो कर उसी स्थान पर जा पहुंचे जहां पीडि़त राग-रागिनियां एकत्रा थीं. द्रवीभूत विष्णु का स्पर्श पा कर राग-रागिनियां स्वस्थ हो गईं. उन्होंने भगवान विष्णु से निवेदन किया कि वे द्रवीभूत रूप में सदा के लिए उसी स्थान में रुक जाएं जिससे अन्य पीडि़तों का भी उद्धार हो सके. भगवान विष्णु ने राग-रागिनियों की प्रार्थना स्वीकार कर ली और नील-जल के रूप में वहीं एक कुण्ड में ठहर गए. यही कुण्ड नारद कुण्ड, नील कुण्ड तथा भीम कुण्ड के नामों से पुकारा जाता है. इस कुण्ड का वर्षा ऋतु के जल जलधर बादलों की भांति नीले रंग का दिखाई पड़ता है.
 एक अन्य कथा के अनुसार देवर्षि नारद ने भवान विष्णु की स्तुति में गंधर्व गायन प्रस्तुत किया जिससे विष्णु अभीभूत हो उठे. वे भावातिरेक में एक जल कुण्ड में परिवर्तित हो गए तथा उनकी श्यामल त्वचा द्रवित हो कर नीले जल में परिवर्तित हो गई.  

भीम द्वारा गदा प्रहार द्वारा जल स्रोत प्रकट करना - दूसरी बहुप्रचलित कथा भीम के द्वारा अपने गदा से भूमि पर प्रहार कर जल स्रोत प्रकट करने की है. इस कथा के अनुसार महाभारत काल में द्यूत-क्रीड़ा में कौरवों से पराजित होने के बाद पांडव अज्ञातवास के लिए निकल पड़े. एक सघन वन से गुजरते समय द्रौपदी को बड़ी जोर की प्यास लगी. पांचो भाइयों ने आस-पास पानी ढूंढा किन्तु वहां पानी का कोई स्रोत नहीं था. उन्होंने द्रौपदी को धीरज बंधाया और कुछ दूर और चलने को कहा. द्रौपदी भी अपनी प्यास पर नियंत्राण रखने का प्रयास करती हुई आगे बढ़ी. किन्तु कुछ दूर जाने पर द्रौपदी का प्यास के मारे बुरा हाल हो गया. वह मूर्छित हो कर गिर पड़ी. पांडवों ने पुनः पानी तलाशा. वहां आस-पास पानी की एक बूंद भी नहीं थी. उन्हें ऐसा लगा कि यदि द्रौपदी को अविलम्ब पानी नहीं मिला तो उसके प्राण-पखेरू उड़ जाएंगे. इस विकट स्थिति में स्वयं को हरसंभव प्रयत्न से शांत रखते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने नकुल को स्मरण कराया कि उसके पास यह क्षमता है कि वह  पाताल की गहराई में स्थित जल का भी पता लगा सकता है.
युधिष्ठिर का कथन स्वीकार करते हुए नकुल ने भूमि को स्पर्श करते हुए ध्यान लगाया. दूसरे ही पल उसे पता चल गया कि किस स्थान पर जल स्रोत है. अब समस्या थी भूमि को भेद कर जल प्राप्त करने की. भीम द्रौपदी की दशा देख कर पहले ही क्रोध से व्याकुल हो रहे थे, जब उन्होंने देखा कि जल स्रोत का पता चलने पर भी जल के दर्शन नहीं हो पा रहे हैं तो उहोंने क्रोधित हो कर अपनी गदा उठाई और नियत स्थान पर गदा से प्रहार किया. 

भीम की गदा के प्रहार से भूमि की कई पर्तों में छेद हो गया और जल दिखाई देने लगा. किन्तु भूमि की सतह से जल स्रोत लगभग 30फिट नीचे था. न तो वहां तक मूर्छित द्रौपदी को ले जाया जा सकता था और न ही जल को द्रौपदी तक लाया जा सकता था. ऐसी स्थिति में युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा कि अब तुम्हें अपनी धनुर्विद्या के कौशल से जल तक पहुंच मार्ग बनाना होगा. यह सुन कर अर्जुन ने धनुष पर बाण चढ़ाया और अपने बाणों से जल स्रोत तक सीढि़यां बना दीं. धनुष की सीढि़यों से द्रौपदी को जल स्रोत तक ले जाया गया. चूंकि भीम की गदा के प्रहार से भूमि में जो कुण्ड बना, वही कुण्ड भीम कुण्ड कहलाया. इस स्थान पर द्रौपदी सहित पाण्डवों ने कुछ समय व्यतीत किया था.
निष्क्रिय ज्वालामुखी - कुछ लोग भीम कुण्ड को निष्क्रिय ज्वालामुखी मानते हैं क्यों कि यह पर्वतीय स्थल में गुफा के भीतर कठोर चट्टानों के बीच जल कुण्ड के रूप में स्थित है तथा कुण्ड की गहराई अथाह है. अब तक कई भू-वैज्ञानिकों ने गोताखोरों द्वारा इसकी गहराई का पता लगाने का प्रयास किया है किन्तु उन्हें कुण्ड का तल नहीं मिला. कुण्ड के तल के बदले लगभग अस्सी फिट की गहराई में तेज जलधाराएं प्रवाहमान मिलीं जो संभवतः इसे समुद्र से जोड़ती हैं. भीम कुण्ड की गहराई भू वैज्ञानिकों के लिए आज रहस्य बनी हुई है. यह भी उल्लेखनीय है कि इस जल कुण्ड का जल-स्तर कभी कम नहीं होता है.
यह जल-कुण्ड वस्तुतः एक गुफा में स्थित है. जल-कुण्ड के ठीक ऊपर वर्तुलाकार बड़ा-सा छेद (कटाव) है जिसके सूर्य की किरणें कुण्ड की जलराशि पर पड़ती है. सूर्य की किरणों में इस जलराशि में मोरपंख के रंगों की आभा झलकती है. यह कहा जाता है कि इस कुण्ड में डूबने वाले का मृत शरीर कभी ऊपर नहीं आता है. इस कुण्ड में डूबने वाला व्यक्ति सदा के लिए अदृश्य हो जाता है. 

भीम कुण्ड के प्रवेश द्वार तक जाने वाली सीढि़यों के ऊपरी सिरे पर चतुर्भुज विष्णु तथा लक्ष्मी का विशाल मंदिर बना हुआ है. विष्णु अपने तीन हाथों में गदा, चक्र एवं शंख धारण किए हुए हैं तथा एक हाथ अभय मुद्रा में है. लक्ष्मी अपने दाएं हाथ में कमल के दो अविकसित पुष्प लिए हुए हैं तथा बायां हाथ दान मुद्रा में है. श्वेत पत्थर से निर्मित दोनों प्रतिमाओं के चेहरे पर स्मित-हास का भाव मन में आनन्द का संचार कर देता है.  विष्णु-लक्ष्मी के मंदिर के समीप विस्तृत प्रांगण में एक प्राचीन मंदिर स्थित है. जिसके ठीक विपरीत दिशा में एक पंक्ति में छोटे-छोटे तीन मंदिर बने हुए हैं जिनमें क्रमशः लक्ष्मी-नृसिंह, राम-दरबार तथा राधा-कृष्ण के मंदिर हैं. 

वस्तुतः भीम कुण्ड एक ऐसा विशिष्ट तीर्थ स्थल है जहां ईश्वर और प्रकृति एकाकार रूप में विद्यमान हैं तथा जहां पहुंच कर प्रकृतिक विशेषताओं के रूप में ईश्वर की सत्ता पर स्वतः विश्वास होने लगता है.
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. इस स्थल के बारे में पहली बार पढ़ा। जानकारी के लिए आभार!

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  2. पढ़ कर मन प्रफुल्लित हो गया ,विष्णु का जल के तरल रूप में परिवर्तित होने की कुछ और भी कथायें सुनी है.
    आभार आपका!

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  3. कभी मौका मिला तो इसे भी देख लिया जायेगा।

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  4. होली मुबारक

    अभी 'प्रहलाद' नहीं हुआ है अर्थात प्रजा का आह्लाद नहीं हुआ है.आह्लाद -खुशी -प्रसन्नता जनता को नसीब नहीं है.करों के भार से ,अपहरण -बलात्कार से,चोरी-डकैती ,लूट-मार से,जनता त्राही-त्राही कर रही है.आज फिर आवश्यकता है -'वराह अवतार' की .वराह=वर+अह =वर यानि अच्छा और अह यानी दिन .इस प्रकार वराह अवतार का मतलब है अच्छा दिन -समय आना.जब जनता जागरूक हो जाती है तो अच्छा समय (दिन) आता है और तभी 'प्रहलाद' का जन्म होता है अर्थात प्रजा का आह्लाद होता है =प्रजा की खुशी होती है.ऐसा होने पर ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्य कश्यप का अंत हो जाता है अर्थात शोषण और उत्पीडन समाप्त हो जाता है.

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  5. जानकारी अच्छी लगी। जरुर जाएंगे देखने।

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