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Sunday, September 25, 2016

वेदों में गायन कला


- डॉ. शरद सिंह
             
गायन मानव की संवेदनाओं को जागृत करता है.आज दुनिया भर में संगीत के महत्व पर वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं . पाश्चात्य  जगत के वैज्ञानिक पृथ्वी के समस्त चेतन तत्वों पर पड़ने वाले संगीत के प्रभाव का अनुसंधान करने में जुटे हुए हैं . जबकि हमारे वैदिक ऋषियों ने संगीत के समस्त प्रभावों को पहले ही जान लिया था तथा गायन को जीवन की प्रत्येक गतिविधि से जोड़ने का आह्वान किया था .
               ऋग्वेद, अथवर्वेद, यजुवेर्द और सामवेद में सामवेद में गायन के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है. वैदिक ऋषि जानते थे कि मानव में आन्तरिक गुणों के विकास के लिए गायन को अपनाया जाना जiरी है . गायन में वह शक्ति है जो आनन्द, प्रेम, श्रद्धा और सद्भावना को जगाती है . गायन के विशेष उतार-च ढ़ाव प्रत्येक जीव से संवाद कर सकते हैं . यदि बांसुरी की धुन पर गाय  आदि पशुओं को नियंत्रित, निदेर्शित किया जा सकता है, डमरू की ध्वनि पर भालू नत्तर्न कर सकता है तथा पक्षी वर्ग स्वयं गाय नयुक्त स्वर में संवाद कर सकता है तो ये संगीत का व्यापक प्रभाव ही है जो प्रत्येक जीव के मन को आंदोलित एवं आल्हादित करता है. वेदों में कहा गया है कि सम्पूणर् सृष्टि लयबद्ध और संगीतमय  है तथा अलौकिक संगीत का प्रवाह सम्पूर्ण सृष्टि में में प्रवाहित होता रहता है. इस अलौकिक संगीत को ही वेदों में अनहद नाद कहा गया है.    
                                                                    
सामवेद में सामगान का वणर्न मिलता है. सामगान को आत्मा का मधुर आलाप कहा गया है.
     तस्य  हैतस्य  साम्नोय : स्वं वेद -
     भवति हास्य  सवं तस्य  वै स्वर एव स्वं  ।। साम. 1.3.25
               संगीत सात स्वर और सात श्रुतियों का समूह है. ये स्वर और श्रुतियां कानों के माध्यम से मन-मतिष्क तक पहुंचती हैं और सुप्त संवेदनाओं को जगा कर स्वर के अनुरूप भावना का संचार करती हैं . संगीत के सात स्वर हैं- स,रे,ग,म,प,ध,नि . इन सभी सात स्वरों की अपनी-अपनी अलग ध्वनि शक्तियां हैं. जैसे, "स' की ध्वनिशक्तियां हैं-तहव्रा, कुमुदवती,मन्दा और छन्दोवती. "रे 'की ध्वनिशक्तियां हैं-दयावती, रंजनी और रतिका . "ग' की रौद्री और क्रोधा. "म' की वज्रिका,प्रसारिणी प्रीति और माजर्नी. "प' की क्षिति, रक्ता, सांदीपिनी एवं अलापिनी. "ध' की मदन्ती, रोहिणी और रम्या. इसी प्रकार "नि' की ध्वनिशक्तियां हैं उग्रा और क्षोभिणी. 
            सामवेद में स्पष्ट कहा गया है कि यदि स्वरों की शक्तियों के अनुरूप गायन किया जाए तो सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.यदि संगीत की स्वर-शक्तियों का उचित अभ्यास हो तो गायक चमत्कारिक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है. गायन ईश्वर तक पहुंच ने का मागर् प्रशस्त करता है. याज्ञवल्यि  स्मृति में गाय न को देव दशर्न का माध्य म बताया गया है-
              अतो गीतप्रपंचस्य  श्रुत्यादेस्तत्वदशर्नात् ।
              अपिस्यात्सच्चिदानन्द रूपिण: परमात्मन:
              प्राप्ति: प्रभावृत्तस्य  मणिलाभो यथाभवेत् ।।  या.स्मृ.718
                
 सामवेद में प्रमुख चार प्रकार के गान का उल्लेख है - ग्रामगेय  गान, अर·य गान, ऊह गान तथा रहस्य  गान.  ग्रामगेय  गान प्रकृति की उपासना का गान है, अरण्य  गान आंतरिक शांति की अनुभूति का गान है, ऊह गान लौकिक आनन्द की अनुभूति का गान है तथा रहस्य  गान लौकिक एवं अलौकिक रहस्यों से तादात्म्य  स्थापित करने का गान है. ये गान जीव में ऊर्जा का संचार करते हैं तथा जीवनचर्या को सदगति प्रदान करते हैं . इसीलिए वैदिक ऋषियों ने मंत्रों एवं श्लोकों को संगीत की स्वरलहरियों में निबद्ध करके उच्चारित करने की परंपरा शुरू की जिससे मंत्रों तथा श्लोकों का समुचित प्रभाव उत्पन्न हो सके.
 सामगान के गायकों को आरोह-अवरोह सहित संगीत के नियमों का पालन करते हुए गाने का अभ्यास कराया जाता था.ये गाय क गुरुकुल में रहते थे और गायनकला में दक्षता प्राप्त करते थे. किसी भी मंत्र को आठ प्रकार से गाया जा सकता था. ये आठ प्रकार अथवा शैलियां थीं- विकार, विश्लेषण, विकषर्ण, अभ्यास, विराम, स्तोभ, आगम और लोप. आलाप के लिए स्तोभ का प्रयोग किया जाता था. जैसे इस मंत्र का स्तोभ शैली में गान किया जाता था-
     अहमस्मि प्रथामजा ऋतस्य  पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य  नाम ।
     यो मा ददाति स इदेवमावदह मन्नमन्न मदन्त मद्मि ।। साम.594
               
वैदिककाल में जब पूरी तन्मयता एवं शात्रीय  संगीतात्मकता के साथ मंत्रों  का उच्चारण किया जाता था तो उसका प्रभाव समस्त चेतन जगत् पर पड़ता था. शाÍीय  विधि से मंत्रों का गायन पवित्रकार्य  माना जाता था. अथवर्वेद में कहा गया हैकि गायन से देव प्रसन्न होते हैं तथा आयु, प्राण, प्रजा, पशुधन, कीर्ति आदि की वृद्धि होती है.
       स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयंतां पावमानी द्विजानाम ।
       आयु: प्राणं प्रजा पशुं कीतिर् द्रविणं ब्रह्मवच र्स्म ।
       मद्दमं दत्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम् ।।  अथवर्. 19.77.1
                                  
            सामवेद का उपवेद गान्धवर्वेद है. गान्धवर्वेद में भारतीय  शात्रीय  राग-रागिनियों, वाद्यों एवं  नृत्यकला का वर्णन है. वेदों में  गायन को उल्लास की पूणर्ता, उत्सव का चरम तथा आह्वान का माध्यम माना गया है. इसीलिए यह माना जाता था कि संगीतमय  मंत्रोच्चार से देवता प्रसन्न होते हैं. यदि देवता का आह्वान करना है तो उसे संगीतात्मक स्वर में आमंत्रित करना चाहिए.
                  बृहदिन्द्राय  गाय त मदतोवृत्रहन्तमम् ।
                  येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय  जागृवि ।। 
                                                                          (य जु. 2.3) 
                   इसी प्रकार याज्ञवल्यि  स्मृति में  मोक्ष प्राप्ति के लिए वाद्यवृंद के सुमधुर संगीत के साथ गायन को महत्वपूर्ण बताया गया है.
              वीणावादनतत्वज्ञः  श्रुतिजाति विशारदः ।
              तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्ग स गच्छति ।। या.स्मृ.718  
 
                वैदिक ऋषि जानते थे कि संगीत की स्वर लहरियों में रोगों को दूर करने की भी क्षमता होती है .   वे जानते थे कि रोग आंतरिक शक्तियों  के क्षीण होने से उत्पन्न होते हैं अतः गायन द्वारा क्षीण आंतरिक शक्तियों को उर्जा प्रदान करके रोगी के रोग को दूर किया जा सकता है. जैसे, नैराश्य  से उत्पन्न रोग को आनन्दपूर्ण गायन से दूर किया जा सकता है. 
                                     
                  
वस्तुतः विश्व के अनेक विद्वान एवं वैज्ञानिक चेतन जगत् पर गायनकला के प्रभावों के बारे में जो खोज कर रहे हैं उन प्रभावों के बारे में वेदों में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है. यदि आवश्यकता है तो वेदों के अध्ययन करने और उसमें निहित ज्ञान को लोकोपयोगी रुप में सामने लाने की.

Thursday, March 20, 2014

भारत का इकलौता मेंढक मंदिर ....


     त्तर प्रदेश में लखनऊ से सीतापुर मार्ग पर लखीमपुर खीरी से लगभग 12 कि.मी. दूर ओएल कस्बा है. यहां भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर स्थित है. लखीमपुर खीरी लखनऊ संभाग के अतंर्गत लखनऊ से उत्तर-पूर्व में स्थित है. यह जनपद पश्चिम में शाहजहांनपुर तथा पीलीभीत, पूर्व में बहराईच, तथा दक्षिण में हरदोई जिले की सीमाओं को स्पर्श करता है. इसी जिले में दुधुवा राष्ट्रीय उद्यान भी है जिसे देखने प्रति वर्ष सैंकड़ों पर्यटक आते हैं. ये पर्यटक ओयल भी अवश्य जाते हैं. ओयल का जितना पर्यटन की दृष्टि से महत्व है उतना ही धार्मिक दृष्टि से भी महत्व है. लखीमपुर खीरी जिले में कुल छः कस्बे हैं जिनमें से एक है ओयल.  
         अतीत में ओयल कस्बा प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्य क्षेत्र का एक हिस्सा था. नैमिषारण्य और हस्तिनापुर मार्ग में पड़ने वाला कस्बा अपनी कला, संस्कृति तथा समृद्धि के लिए विख्यात था. ओयल शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था. ओयल के शासक भगवान शिव के उपासक थे. ओयल कस्बे के मध्य में स्थित मेंढक मंदिर पर आधारित प्राचीन शिव मंदिर अद्भुत है. 
ओयल का मेंढक मंदिर
                            
        मेंढक मंदिर देश में अपने ढंग का अकेला और अनोखा मंदिर है. मेंढक एक ऐसा उभयचर प्राणी है जो वर्षा होने की सूचना देता है. अतः इसे वृष्टि एवं अनावृष्टि से संबंध माना जाता है. यह माना जाता है कि राज्य को सूखे तथा बाढ़ की प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया गया. अतीत में यह कस्बा नैमिषारण्य क्षेत्रा का एक हिस्सा था. नैमिषारण्य वही प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है जहां दधीचि ने अपनी अस्थियां देवताओं को प्रदान की थीं. अतः यह सम्पूर्ण क्षेत्र प्राचीनकाल से धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्रियाकलापों का केन्द्र रहा है.
ओयल के मेंढक मंदिर का शिखर
    ओयल शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था. और यहां के शासक भगवान शिव के उपासक थे. ओयल कस्बे के मध्य में स्थित मंडूक यंत्र पर आधारित प्राचीन शिव मंदिर इस कस्बे की ऐतिहासिक गरिमा को प्रमाणित करता है. ग्यारहवीं शती के बाद से यह क्षेत्रा चाहमान शासकों के आधीन रहा. 19 वीं सदी के प्रारम्भ में चाहमान वंश के तत्कालीन यशस्वी राजा बख्श सिंह ने जन कल्याण की भावना से प्रेरित हो कर इस अद्भुत मंदिर का निर्माण कराया. मंदिर की वास्तु परिकल्पना कपिला के एक महान तांत्रिक ने की थी. तंत्रवाद पर आधारित इस मंदिर की वास्तु संरचना अपनी विशेष शैली के कारण ध्यान आकृष्ट करती है.
      
मंदिर के आधार पर विशालकाय मेंढक-आकृति
               ओयल में विशालकाय मेंढक मंदिर प्राचीन तांत्रिक परम्परा का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं. मेंढक मंदिर अड़तीस मीटर लम्बाई, पच्चीस मीटर चौड़ाई में निर्मित एक मेढक की पीठ पर बना हुआ है. पाषाण निर्मित मेंढक का मुख तथा अगले दो पैर उत्तर की दिशा में हैं. मेंढक का मुख 2 मीटर लम्बा, डेढ़ मीटर चौड़ा तथा 1 मीटर ऊंचा है.  इसके पीछे का भाग 2 मीटर लम्बा तथा 1.5 मीटर चौड़ा है. पिछले पैर दक्षिण दिशा में दिखाई हैं. मेंढक की उभरी हुई गोलाकार आंखें तथा मुख का भाग बड़ा जीवन्त प्रतीत होता है. मेंढक के शरीर का आगे का भाग उठा हुआ तथा पीछे का भाग दबा हुआ है जोकि वास्तविक मेंढक के बैठने की स्वाभविकमुद्रा है.                                  
       ग्यारहवीं सदी की तांत्रिक संरचनाओं में अष्टदल कमल का बहुत महत्व रहा है.  ओयल इस मंदिर ही अष्टदल कमल को विशेष महत्व दिया गया है. मंदिर का आधार भाग अष्टदल कमल के आकार का बना हुआ है. 
मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग
 मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर तथा दूसरा द्वार दक्षिण की ओर है. मंदिर में काले-स्लेटी पाषाण का भव्य शिवलिंग है. जो श्वेत संगमरमर की 1 मीटर उंचाई तथा 0.7 मीटर व्यास की दीर्घा में गर्भगृह के मध्य स्थित है. इस शिवलिंग को भी कमल के फूल पर अवस्थित किया गया है. इसके समीप उत्तर-पूर्व कोने पर श्वेत संगमरमर की निर्मित नंदी वाहन की प्रतिम है. मंदिर के अंदर से सुरंग मार्ग है. जो मंदिर के प्रांगण के बाहर पश्चिम की ओर खुलता है.यह आज भी प्रयोग में लाया जाता है. अनुमान है कि प्राचीन काल में इस सुरंग मार्ग से राज परिवार तथा विशिष्ट पुजारी गण आते-जाते रहे होंगे. मंदिर का विशाल प्रांगण में जिसके मध्य यह मंदिर निर्मित है लगभग 100 मीटर का वर्गाकार है. मंदिर का निर्माण वर्गाकार जगती के उपर किया गया है. मंदिर के उपर तक जाने के लिए चारो तरफ सीढ़ियां बनी हैं. सीढ़ियों द्वारा भक्त उस धरातल पर पहुंचता है जहां से उसे आठ कोणीय सतह के उपर जाने का मार्ग मिलता है. इस कोण के बाद अष्टदल कमल की अर्द्धवृत्ताकार पंखुड़ियों को पार कर तीन वृत्ताकार सीढ़ियों के बाद अष्टकोणीय धरातल है. यहां पर चतुष्कोणीय गर्भगृह है.
          मंदिर का निर्माण ईंटों और चूने के गारे से किया गया है. इसमें सबसे नीचे एक विशाल मेंढक का निर्माण किया गया है. उसके ऊपर पांच मीटर उंची जगती बनाई गई है. जिसके चारो तरफ पांच सीढ़ियां हैं. मंदिर की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, साधु-संतों और योगियों की विभिन्न मुद्राओं में प्लास्टर निर्मित मूर्तियां हैं. सबसे ऊपर मंदिर का गुम्बदाकार शिखर है. मंदिर के चारो कोनों पर चार अन्य छोटे मंदिर निर्मित किए गए हैं. ये मंदिर भी वास्तु संरचना में अष्टकोणीय हैं. किसी भी छोटे मंदिर में देव मूर्ति की स्थापना नहीं की गई है. मंदिर का भीतरी भाग दांतेदार मेहराबों, पद्म पंखुड़ियों , पुष्प पत्र अलंकरणों से चित्रांकित है. मंदिर के मुख्य गर्भगृह में सहस्त्र कमल दलों से अलंकृत सफेद संगमरमर की दीर्घा है. मंदिर के चारो ओर लगभग 150 मीटर वर्गाकार में चहारदीवारी निर्मित है.
          मंदिर की दीवारों पर तथा चारो कोनों पर बने लघु मंदिरों की दीवारों पर शिव साधना में रत अनेक आकृतियां उत्कीर्ण हैं. इनमें खड्ग धारिणी देवी चामुण्डा, मोरनी पर आरूढ़ चार शीश वाले देवता तथा आत्म-बलि के दृश्य बने हुए हैं. चार सिर वाले देवता का चौथा सिर मुख्या सिर के ठीक ऊपर बनाया गया है. इनके ठीक पीछे एक अन्य देवता विराजमान हैं. आत्म-बलि का दृश्य अद्भुत है. इसमें एक स्त्री को करवट लेटे हुए एक पुरूष के शरीर पर बैठे हुए दिखाया गया है. वह स्त्री अपने दाएं हाथ में धारदार हथियार रखे हुए है तथा उसके बाएं हाथ में उसका कटा हुआ सिर है जिसका मुख खुला हुआ है. कटी हुई गरदन से रक्त की धार निकल कर खुले हुए मुख में गिर रही है. मूलतः यह स्व-रक्तपान का दृश्य है जो तांत्रिक अनुष्ठान की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है. उस स्त्री के दोनों पार्श्व में सेविकाएं खड़ी हुई हैं  जो इस तांत्रिक क्रिया की साक्षी एवं सहयोगिनी हैं.
मंदिर की बाहरी दीव
    जिन विशालकाय ताखों में तांत्रिक क्रियाओं वाली मूर्तियों को प्रदर्शित किया गया है वे बेल-बूटे के सुन्दर अंकनों से सुसज्जित हैं. मंदिर की भीतरी दीवारों को भी सुंदर बेल-बूटों से सजाया गया है.  मंदिर की जगती पर पूर्व की ओर लगभग 2 फुट व्यास का एक कुआं बना हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि इस कुए का जल-स्तर भूतल के समानांतर है. मंदिर के उत्तर में 2 की.मी. लम्बा और 1 कि.मी. कुण्ड है जो संभवतः भक्तजन के स्नान के लिए बनाया गया होगा.
           यूं तो देश के अनेक स्थान पर तंत्रवाद से संबंधित मंदिर एवं प्रतिमाएं पाई जाती हैं जिनमें चौसठ योगिनियों के मंदिर प्रमुख हैं किन्तु मांडूक तंत्रपर आधारित यह मेंढक मंदिर अद्वितीय है.

Thursday, July 11, 2013

नचना कुठारा का पार्वती मंदिर

- डॉ. शरद सिंह

नचना कुठारा मध्य प्रदेश के पन्ना ज़िले में स्थित है। यह अपने मंदिर के लिए विशिष्ट रूप से जाना जाता है। नचना कुठारा के मंदिर पूर्व गुप्त कालीन वास्तुकला का प्रतिनिधित्व करते हैं। 
 
Ardhanarishwar OF NACHANA KUTHARA
जनरल कनिंघम के अनुसार यह देवी पार्वती का मंदिर है। मंदिर का गर्भगृह 15½ फुट बाहर और 8 फुट अंदर से है। गर्भगृह के चारों ओर पटा हुआ प्रदक्षिणा मार्ग 33 फुट बाहर और 26 फुट अंदर से है। मंडप 26 फुट × 12 फुट है। 

मंदिर के बाहर प्रांगण में विषपायी शिव की चतुर्मुखी प्रतिमा है जिसमें शिव के खुले हुए मुख के भाव विष की कड़वाहट को प्रदर्शित करते हैं।
GANGA OF NACHANA KUTHARA

नचना में राम के वनगमन की बहुत सुन्दर प्रतिमा मौजूद है। इसमें राम, सीता और लक्ष्मण को दिखाया गया है। यहां उपलब्ध अन्य प्रतिमाएं भी अत्यंत कलात्मक एवं नयनाभिराम हैं।
PARVATI TEMPLE OF NACHANA KUTHARA




Monday, April 01, 2013

ऐतिहासिक ऐरण



- डॉ. शरद सिंह

600 ई.पू. के लगभग सागर ज़िले का सम्पूणर् भू-भाग चेदि जनपद में सम्मिलित था। बौद्धकाल में विदिशा व्यापारिक मार्गों का केन्द्र बिन्दु था । एरण से होता हुआ एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग उज्जैनी से विदिशा तक जाता था । इस मागर् में सागर ज़िले का भू-भाग स्थित था । महाभारतकाल में भीम ने हस्तिनापुर से प्रस्थान कर दशार्ण और चेदि पर अधिकार किया था । महाभारत के दूसरे पर्व के  उन्तीसवें अध्याय  में उल्लेख मिलता है कि पांडुपुत्र भीम ने भी हस्तिनापुर की दिशा से दशार्ण और चेदि पर अधिकार किया था । इसी प्रकार दूसरे पर्व के इकतीसवें अध्याय  में वर्णित है कि पांडुपुत्र सहदेव ने माहिष्मती के आगे त्रिपुरी और उसके दक्षिणवर्ती प्रदेशों पर विजय  प्राप्त की थी ।  कालिदास के मेघदूत में जिस रामटेक -अमरकंटक अर्थात विदिशा-उज्जैन मार्ग का उल्लेख किया गया है उस पर भी सागर स्थित था । इसके अतिरिक्त महाभाष्य  में भी इस तथ्य  की चर्चा है कि  भरहुत, कोशाम्बी मार्ग  सागर से हो कर गुजरता था ।

 इतिहासकार अलबरूनी ने भी बुन्देलखण्ड की तत्कालीन स्थितियों का विस्तृत वर्णन करते हुए लिखा है कि  इस क्षेत्र से होता हुआ एक मार्ग खजुराहो से कन्नौज तक जाता था ।  प्राचीन राजपथ पर स्थित होने के कारण सागर क्षेत्र का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक महत्व प्राचीनकाल से ही रहा ।

बौद्धकाल में सागर चेदि जनपद के अंतगर्त अवंति राज्य  के आधीन रहा । चण्डप्रद्योत के शासनकाल में भी सागर अवंति के अंतर्गत था । ई.पू.413 से 395 ई.पू. के मध्य  सागर का क्षेत्र मगध साम्राज्य  के अंतगर्त आ गया । 345 ई.पू. नंदवंश की स्थापना के बाद चौथी शती ई.पू. में सागर क्षेत्र दशार्णा जनपद के अंतर्गत था । मौर्य काल में दो स्वतंत्र शासकों राजा धर्मपाल और राजा इन्द्रगुप्त ने एरण के पर शासन किया । एरण से धर्मपाल के सिक्के तथा इन्द्रगुप्त की प्रशासकीय मुद्रा प्राप्त हुई है ।
 
तीसरी शताबदी के उत्तरार्द्ध में नागवंशीय  राजाओं ने शक-क्षत्रपों के स्थान पर अपनी सत्ता स्थापित की । एरण से नागराजा गणपति नाग और रविनाग की मुद्राएं मिली हैं । यहीं से दूसरी-तीसरी शताबदी की एक नागपुरुष प्रतिमा भी प्राप्त हुई है । लगभग 34 ई. में सागर क्षेत्र गुप्त राजाओं के आधीन चला गया । समुद्रगुप्त के प्रयाग स्तम्भ अभिलेख तथा एरण अभिलेख से ज्ञात होता है कि एरण सहित सागर गुप्त साम्राज्य  के आधीन था । चन्द्रगुप्त द्वितीय  ने एरण के निकट  शक राज का वध किया था । तत्पश्चात, उसने अपने अग्रज रामगुप्त की पत्नी ध्रुवस्वामिनी से विवाह किया था । रामगुप्त की मुद्राएं एरण तथा विदिशा से प्राप्त होती हैं ।


ऐरण की गुप्तयुगीन विष्णु प्रतिमा में गोलाकार प्रभा मण्डल, शैल के विकसित स्वरुप का प्रतीक है। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के एक शिलालेख में एरण को 'एरकिण' कहा गया है। इस अभिलेख को कनिंघम ने खोजा था। यह वर्तमान में कोलकाता संग्रहालय में सुरक्षित है। यह भग्नावस्था में हैं। फिर भी जितना बचा है, उससे समुद्रगुप्त के बारे में काफ़ी जानकारी प्राप्त होती है। इसमें समुद्रगुप्त की वीरता, सम्पत्ति-भण्डार, पुत्र-पौत्रों सहित यात्राओं पर उसकी वीरोचित धाक का विशद वर्णन है। यहाँ गुप्त सम्राट बुद्धगुप्त का भी अभिलेख प्राप्त हुआ है। इससे ज्ञात होता है, कि पूर्वी मालवा भी उसके साम्राज्य में शामिल था। इसमें कहा गया है कि बुद्धगुप्त की अधीनता में यमुना और नर्मदा नदी के बीच के प्रदेश में 'महाराज सुरश्मिचन्द्र' शासन कर रहा था। एरण प्रदेश में उसकी अधीनता में मातृविष्णु शासन कर रहा था। यह लेख एक स्तम्भ पर ख़ुदा हुआ है, जिसे ध्वजास्तम्भ कहते हैं। इसका निर्माण महाराज मातृविष्णु तथा उसके छोटे भाई धन्यगुप्त ने करवाया था। यह आज भी अपने स्थान पर अक्षुण्ण है। यह स्तम्भ 43 फुट ऊँचा और 13 फुट वर्गाकार आधार पर खड़ा किया गया है। इसके ऊपर 5 फुट ऊँची गरुड़ की दोरुखी मूर्ति है, जिसके पीछे चक्र का अंकन है। एरण से एक अन्य अभिलेख प्राप्त हुआ है, जो 510 ई. का है। 
          समुद्रगुप्त के ऐरण अभिलेख में लिखा हुआ है : ‘‘स्वभोग नगर ऐरिकरण प्रदेश...,’’ यानि स्वभोग के लिए समुद्रगुप्त ऐरिकिण जाता रहता था। बीना नदी के किनारे ऐरण में कुवेर नागा की पुत्री प्रभावती गुप्ता रहा करती थी जिसके समय काव्य, स्तंभ, वाराह और विष्णु की मूर्तिया दर्शनीय है। 


इसकी समय पन्ना नागौद क्षेत्र में उच्छकल्प जाति कें क्षत्रियों का शासन स्थापित हुआ था जबकि जबलपुर परिक्षेत्र में खपरिका सागर और जालौन क्षेत्र में दांगी राज्य बन गये थे। जिनकी राजधानी गड़पैरा थी दक्षिणी पश्चिमी झांसी–ग्वालियर के अमीर वर्ग के अहीरों की सत्ता थी तो धसान क्षेत्र के परिक्षेत्र में मांदेले प्रभावशाली हो गये थे।
एरण से बुधगुप्त का अभिलेख भी मिला है । लगभग 5वीं शती ई. में एरण पर हूण राजा तोरमान का अधिकार स्थापित हुआ । सन 510 ई. के एरण के गोपराज सतीस्तम्भ लेख में युद्ध में राजा गोपराज के वीरगति पाने के बाद उसकी रानी के सती होने का उल्लेख है । गोपराज गुप्त शासक भानुगुप्त का सामंत था । 
        सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण गुप्तकाल में मिलता है 510 ई.पू. के एक लेख से पता चलता है कि गुप्त नरेश भानुगुप्त का सामन्त गोपराज हूणों के विरुद्ध युद्ध करता हुआ मारा गया और उसकी पत्नी उसके शव के साथ सती हो गई थी।
      एरण में गुप्तकालीन नृसिंह मन्दिर, वराह मन्दिर तथा विष्णु मन्दिर पाये गये हैं। ये सब अब खण्डहर हो के हैं।  

Sunday, February 10, 2013

भीम कुण्ड : जहां विष्णु तरल रूप में हैं




- डॉ.सुश्री शरद सिंह

सुरम्य प्राकृतिक स्थलों में देवताओं का वास होता है. एक ऐसा ही सिद्ध क्षेत्रा तीर्थ स्थल है भीम कुण्ड. विश्व प्रसिद्ध कलातीर्थ खजुराहो से लगभग 128 कि.मी. दूर स्थित भीम कुण्ड आदिकाल से ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों एवं साधकों के आकर्षण का केन्द्र रहा है. वर्तमान समय में यह धार्मिक-पर्यटन एवं वैज्ञानिक शोध का केन्द्र भी बनता जा रहा है. यहां स्थित जल-कुण्ड भू-वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय रहा है. अनेक शोधकर्ता इस जलकुण्ड में कई बार गोताखोर उतार चुके हैं किन्तु इस जलकुण्ड की थाह आज तक कोई भी नहीं पा सका है.

 पौराणिक ग्रंथों में भीम कुण्ड का नारद कुण्ड तथा नील कुण्ड के नाम से भी उल्लेख मिलता है. भीम कुण्ड के संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं. जिनमें से प्रमुख हैं- देवर्षि नारद द्वारा साम गान का गायन तथा  भीम द्वारा गदा प्रहार द्वारा जल स्रोत प्रकट करना.

देवर्षि नारद द्वारा साम गान का गायन - पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवर्षि नारद आकाश मार्ग से विचरण कर रहे थे. रास्ते में उन्हें अनेक विकलांग स्त्री-पुरुष दिखाई पड़े. वे स्त्री-पुरुष न केवल विकलांग थे अपितु घायल भी थे तथा कराह रहे थे. यह दृश्य देख कर देवर्षि नारद दुखी हो गए. वे उन स्त्री-पुरुषों के पास पहुंचे और उन्होंने उनसे उनका परिचय पूछा. उन स्त्री-पुरुषों ने बताया कि वे संगीत की राग-रागिनियां हैं. यह सुन कर देवर्षि नारद को बहुत आश्चर्य हुआ. उन्होंने राग-रागिनियों से पूछा कि तुम लोगों की ये दशा कैसे हुई बताओ तथा तुम्हारे दुख-कष्ट को दूर करने के लिए मैं क्या कर सकता हूं, यह भी बताओ. देवर्षि नारद के पूछने पर राग-रागिनियों ने बताया कि पृथ्वी पर स्थित अनाड़ी गायक-गायिकाओं द्वारा दोषपूर्ण गायन के कारण हमारे अस्तित्व को क्षति पहुंची है. अब तो हमारा उद्धार तभी हो सकता है जब संगीत विद्या में निपुण कोई कुशल गायक साम गान का गायन करे.
देवर्षि नारद साम गान के ज्ञाता थे. राग-रागिनियों की बात सुन कर वे स्वयं को रोक नहीं सके और उन्होंने साम गान का गायन प्रारम्भ कर दिया. देवर्षि नारद का स्वर तीनों लोकों में व्याप्त होने लगा. देवता साम गान के स्वरों में मग्न होने लगे. भगवान शिव नर्तन कर उठे तथा भगवान ब्रह्मा ताल देने लगे. साम गान के स्वरों को सुन कर तथा इस अलौकिक दृश्य को देख कर भगवान विष्णु इतने भावविभोर हो उठे कि वे द्रवीभूत हो कर उसी स्थान पर जा पहुंचे जहां पीडि़त राग-रागिनियां एकत्रा थीं. द्रवीभूत विष्णु का स्पर्श पा कर राग-रागिनियां स्वस्थ हो गईं. उन्होंने भगवान विष्णु से निवेदन किया कि वे द्रवीभूत रूप में सदा के लिए उसी स्थान में रुक जाएं जिससे अन्य पीडि़तों का भी उद्धार हो सके. भगवान विष्णु ने राग-रागिनियों की प्रार्थना स्वीकार कर ली और नील-जल के रूप में वहीं एक कुण्ड में ठहर गए. यही कुण्ड नारद कुण्ड, नील कुण्ड तथा भीम कुण्ड के नामों से पुकारा जाता है. इस कुण्ड का वर्षा ऋतु के जल जलधर बादलों की भांति नीले रंग का दिखाई पड़ता है.
 एक अन्य कथा के अनुसार देवर्षि नारद ने भवान विष्णु की स्तुति में गंधर्व गायन प्रस्तुत किया जिससे विष्णु अभीभूत हो उठे. वे भावातिरेक में एक जल कुण्ड में परिवर्तित हो गए तथा उनकी श्यामल त्वचा द्रवित हो कर नीले जल में परिवर्तित हो गई.  

भीम द्वारा गदा प्रहार द्वारा जल स्रोत प्रकट करना - दूसरी बहुप्रचलित कथा भीम के द्वारा अपने गदा से भूमि पर प्रहार कर जल स्रोत प्रकट करने की है. इस कथा के अनुसार महाभारत काल में द्यूत-क्रीड़ा में कौरवों से पराजित होने के बाद पांडव अज्ञातवास के लिए निकल पड़े. एक सघन वन से गुजरते समय द्रौपदी को बड़ी जोर की प्यास लगी. पांचो भाइयों ने आस-पास पानी ढूंढा किन्तु वहां पानी का कोई स्रोत नहीं था. उन्होंने द्रौपदी को धीरज बंधाया और कुछ दूर और चलने को कहा. द्रौपदी भी अपनी प्यास पर नियंत्राण रखने का प्रयास करती हुई आगे बढ़ी. किन्तु कुछ दूर जाने पर द्रौपदी का प्यास के मारे बुरा हाल हो गया. वह मूर्छित हो कर गिर पड़ी. पांडवों ने पुनः पानी तलाशा. वहां आस-पास पानी की एक बूंद भी नहीं थी. उन्हें ऐसा लगा कि यदि द्रौपदी को अविलम्ब पानी नहीं मिला तो उसके प्राण-पखेरू उड़ जाएंगे. इस विकट स्थिति में स्वयं को हरसंभव प्रयत्न से शांत रखते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने नकुल को स्मरण कराया कि उसके पास यह क्षमता है कि वह  पाताल की गहराई में स्थित जल का भी पता लगा सकता है.
युधिष्ठिर का कथन स्वीकार करते हुए नकुल ने भूमि को स्पर्श करते हुए ध्यान लगाया. दूसरे ही पल उसे पता चल गया कि किस स्थान पर जल स्रोत है. अब समस्या थी भूमि को भेद कर जल प्राप्त करने की. भीम द्रौपदी की दशा देख कर पहले ही क्रोध से व्याकुल हो रहे थे, जब उन्होंने देखा कि जल स्रोत का पता चलने पर भी जल के दर्शन नहीं हो पा रहे हैं तो उहोंने क्रोधित हो कर अपनी गदा उठाई और नियत स्थान पर गदा से प्रहार किया. 

भीम की गदा के प्रहार से भूमि की कई पर्तों में छेद हो गया और जल दिखाई देने लगा. किन्तु भूमि की सतह से जल स्रोत लगभग 30फिट नीचे था. न तो वहां तक मूर्छित द्रौपदी को ले जाया जा सकता था और न ही जल को द्रौपदी तक लाया जा सकता था. ऐसी स्थिति में युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा कि अब तुम्हें अपनी धनुर्विद्या के कौशल से जल तक पहुंच मार्ग बनाना होगा. यह सुन कर अर्जुन ने धनुष पर बाण चढ़ाया और अपने बाणों से जल स्रोत तक सीढि़यां बना दीं. धनुष की सीढि़यों से द्रौपदी को जल स्रोत तक ले जाया गया. चूंकि भीम की गदा के प्रहार से भूमि में जो कुण्ड बना, वही कुण्ड भीम कुण्ड कहलाया. इस स्थान पर द्रौपदी सहित पाण्डवों ने कुछ समय व्यतीत किया था.
निष्क्रिय ज्वालामुखी - कुछ लोग भीम कुण्ड को निष्क्रिय ज्वालामुखी मानते हैं क्यों कि यह पर्वतीय स्थल में गुफा के भीतर कठोर चट्टानों के बीच जल कुण्ड के रूप में स्थित है तथा कुण्ड की गहराई अथाह है. अब तक कई भू-वैज्ञानिकों ने गोताखोरों द्वारा इसकी गहराई का पता लगाने का प्रयास किया है किन्तु उन्हें कुण्ड का तल नहीं मिला. कुण्ड के तल के बदले लगभग अस्सी फिट की गहराई में तेज जलधाराएं प्रवाहमान मिलीं जो संभवतः इसे समुद्र से जोड़ती हैं. भीम कुण्ड की गहराई भू वैज्ञानिकों के लिए आज रहस्य बनी हुई है. यह भी उल्लेखनीय है कि इस जल कुण्ड का जल-स्तर कभी कम नहीं होता है.
यह जल-कुण्ड वस्तुतः एक गुफा में स्थित है. जल-कुण्ड के ठीक ऊपर वर्तुलाकार बड़ा-सा छेद (कटाव) है जिसके सूर्य की किरणें कुण्ड की जलराशि पर पड़ती है. सूर्य की किरणों में इस जलराशि में मोरपंख के रंगों की आभा झलकती है. यह कहा जाता है कि इस कुण्ड में डूबने वाले का मृत शरीर कभी ऊपर नहीं आता है. इस कुण्ड में डूबने वाला व्यक्ति सदा के लिए अदृश्य हो जाता है. 

भीम कुण्ड के प्रवेश द्वार तक जाने वाली सीढि़यों के ऊपरी सिरे पर चतुर्भुज विष्णु तथा लक्ष्मी का विशाल मंदिर बना हुआ है. विष्णु अपने तीन हाथों में गदा, चक्र एवं शंख धारण किए हुए हैं तथा एक हाथ अभय मुद्रा में है. लक्ष्मी अपने दाएं हाथ में कमल के दो अविकसित पुष्प लिए हुए हैं तथा बायां हाथ दान मुद्रा में है. श्वेत पत्थर से निर्मित दोनों प्रतिमाओं के चेहरे पर स्मित-हास का भाव मन में आनन्द का संचार कर देता है.  विष्णु-लक्ष्मी के मंदिर के समीप विस्तृत प्रांगण में एक प्राचीन मंदिर स्थित है. जिसके ठीक विपरीत दिशा में एक पंक्ति में छोटे-छोटे तीन मंदिर बने हुए हैं जिनमें क्रमशः लक्ष्मी-नृसिंह, राम-दरबार तथा राधा-कृष्ण के मंदिर हैं. 

वस्तुतः भीम कुण्ड एक ऐसा विशिष्ट तीर्थ स्थल है जहां ईश्वर और प्रकृति एकाकार रूप में विद्यमान हैं तथा जहां पहुंच कर प्रकृतिक विशेषताओं के रूप में ईश्वर की सत्ता पर स्वतः विश्वास होने लगता है.