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Monday, June 25, 2012

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में दिए गए व्याख्यान का वीडियो....... Video of Dr (Miss) Sharad Singh's lecture at Gurukul Kangri University, Haridwar (Uttarakhand), India


गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में दिए गए व्याख्यान का वीडियो.......
Video of  Dr (Miss) Sharad Singh's lecture at Gurukul Kangri University, Haridwar (Uttarakhand), India 
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PART-1 ....



PART-2 ....



PART-3 ....



PART-4 ....  


 
 

Sunday, June 03, 2012

Dr (Miss) Sharad Singh’s Interview and Documentary courtesy DIGI NEWS TV Channel



On the occasion of Madhya Pradeh's great medieval warrior Bundel Kesari Maharaj Chhatrasal's 363rd birth anniversary (24th May 2012), H'ble Governor of Madhya Pradesh Shri Ram Naresh Yadav honored Dr.(Sushri) Sharad Singh with prestigious "Jauhari Samman" for her book "Patton Me Quid Auraten". After the Award Ceremony an interview with documentary on Dr Sharad Singh presented by the DIGI News TV Channel on dated 28.05.2012.
'Patton Men Quaid Auraten' (women captive in leaves) book is focus on the life of Bidi Worker women of Bundelkhand region of Madhya Pradesh State of India.

डॉ. शरद सिह ‘‘जौहरी सम्मान’’ से सम्मानित......

Dr Sharad Singh Honored by H'ble Governor of Madhya Pradesh Shri Ram Naresh Yadav
महाराजा छत्रसाल जयंती, दिनांक 24.05.2012 के अवसर पर अखिल भारतीय बुन्देलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद् भोपाल (म.प्र.) द्वारा राजभवन में आयोजित गरिमामय बुन्देलत्रयी सम्मान समारोह में मध्यप्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री रामनरेश यादव द्वारा सुपरिचित कथाकार एवं उपन्यासकार लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को उनकी पुस्तक ‘पत्तों में क़ैद औरतें’ के लिए ‘जौहरी सम्मान’ से सम्मानित किया गया। शरद सिंह की यह पुस्तक बुन्देलखण्ड के संदर्भ में जि़ला सागर (म.प्र.) की बीड़ी महिला श्रमिकों पर केन्द्रित है।
Dr Sharad Singh Honored by H'ble Governor of Madhya Pradesh Shri Ram Naresh Yadav

Dr Sharad Singh Honored by H'ble Governor of Madhya Pradesh Shri Ram Naresh Yadav

Dr Sharad Singh Honored by H'ble Governor of Madhya Pradesh Shri Ram Naresh Yadav

Monday, May 21, 2012

खजुराहो में सुर-सुन्दरियों एवं नर्तकियों की वेशभूषा



- डॉ. शरद सिंह

व्यक्तित्व को आकर्षित बनाने के लिये वेश-भूषा का महत्व सदैव रहा है. इससे जहां एक ओर तत्कालीन संस्कृति का बोध होता है, वहीं दूसरी और व्यक्ति की रुचि तथा जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश पड़ता है। गुप्तकाल में प्रचलित वेशभूषा की अगली कड़ी खजुराहो की प्रतिमा-शिल्प में दिखाई देती है। शारीरिक सौष्ठव के सौन्दर्य को उन्मुक्त भाव से प्रदर्शित करने के साथ ही वेश-भूषा के अंकन को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है। अर्थात् खजुराहो के शिल्पकारों ने मूर्तिकला के सौन्दर्य में वेश-भूषा को एक महत्वपूर्ण तत्व माना है।
   सुर-सुन्दरियों को साड़ी पहने हुये अंकित किया गया है, जो कमर से एड़ी तक है जिसमें सामने की और चुन्नटें है. जिनका एक सिरा सामने की और लटकता रहता था तथा दूसरा कांछ के समान पीछे खोंस लिया जाता था. जिससे यह चुस्त और सुविधाजनक रहती थी. दूसरा ढंग सादा था जिसमें साड़ी को लुंगी के समान बांध लिया जाता था. साड़ी का निचला सिरा एडि़यों से कुछ ऊपर तथा ऊपरी सिरा कमर के चारों और लिपटा रहता था. पार्श्व नाथ तथा विश्वनाथ मंदिर में उत्कीर्ण एक सुन्दरी तथा अप्सरा को इसी प्रकार की साड़ी पहने दिखाया गया है.
     नर्तकियों की साड़ी अपेक्षाकृत छोटी और पाजामे के समान चुस्त रहती थी। इस प्रकार की साड़ी की चौड़ाई कम होती थी जिससे घुटनों तक का भाग ही ढंका रहता था। लक्ष्मण मंदिर में नृत्यरत् एक अप्सरा को इसी प्रकार की धोती पहने दिखाया गया है. नर्तकियों एड़ियों से ऊपर चुस्त पाजामा जैसा वस्त्र भी पहनती थीं। 
     सुर सुन्दरियों एवम् अप्सराओं की मूर्तियों में वक्ष स्थल प्रायः अनावृत्त प्रदर्शित किया गया है किन्तु कुछ मूर्तियों में चोली या कुच बंध का अंकन है। कंदरिया महादेव मंदिर में कामुक मुद्रा में प्रदर्शित एक सुन्दरी को पट्टिका के रूप में चोली धारण किये है जिसे पीठ पर गांठ बांध कर पहना गया है। लक्ष्मण मंदिर में एक अप्सरा को चोली पहनते हुये दिखाया गया है, जिसमें वह दायें हाथ से अपने स्तन को थामे हुये है। उसका बांया हाथ सिर से होता हुआ दायें कंधे की चोली को व्यवस्थित कर रही है। नृत्यांगनाओं की वेशभूषा दुपट्टा या चुनरी विहीन है। लक्ष्मण मंदिर में कंदुक क्रीड़ा करती एक सुन्दरी को अवश्य दुपट्टा युक्त अंकित किया गया है।
   खजुराहो के मंदिर जहां एक ओर धर्म और आध्यात्म से जोड़ते हैं, वहीं ये तत्कालीन नर्तकियों की वेशभूषा का बोध भी कराते हैं.

Thursday, May 10, 2012

रहली का सूर्य मंदिर




रहली की सूर्य प्रतिमा





- डॉ. शरद सिंह


























































































रहली का सूर्य मंदिर




































इसी सूर्य प्रतिमा से संबंधित एक समाचार दैनिक भास्कर 
समाचारपत्र में प्रकाशित -

Monday, April 30, 2012

GANGA - The river of life (A film by Dr Sharad Singh))

इस बार मुलाक़ात एक ऐतिहासिक नदी से जो हमारे जीवन, मन, आस्था, विश्वास और इतिहास का अभिन्न अंग है।



इसे देखने के लिए कृपया क्लिक करें -


Wednesday, March 28, 2012

खजुराहो की मूर्तिकला में स्त्री-शिक्षा

- डॉ. शरद सिंह


    खजुराहो के चितेरों ने जहां नृत्य तथा वादन को उकेरा, वहीं लेखन तथा पठन को भी स्थान दिया है . खजुराहो की मूर्तियों में अत्यंत कलात्मक ढंग से लेखन एवं पठन क्रिया को ढाला गया है। इनसे पता चलता है कि चंदेल काल में स्त्री-शिक्षा पर ध्यान दिया जाता था. कम से कम मध्यम और उच्च वर्ग की स्त्रियां शिक्षित होती थीं.  
विश्वनाथ मंदिर में एक नारी को कागजों के पुलन्दे सहित दिखाया गया है. वह सामने खड़े पुरुष को कुछ समझा रही है.  इसी मंदिर के अन्य दृश्य में एक नारी पुस्तक रख कर गुरु से पढ़ती हुई दिखाई गई है. समस्त ललित कलाओं की शिक्षा गुरू से लिए जाने की परम्परा कला के उद्भव से ही चली आ रही है.                                               
    लेखन से संबंधित अनेक प्रतिमाएं खजुराहो में विद्यमान हैं. किसी में पत्र लिखती हुई नारी दिखाई गई है तो किसी में स्वाभाविक उत्सुकता का भाव लिए हुए पत्र पढ़ती हुई नारी अंकित है. एक से अधिक कागजों को रखे हुये प्रसन्न चित्त नारी की प्रतिमा भी है. जो या तो पत्र पढ़ रही है अथवा किसी नृत्य-नाट्य की पटकथा को पढ़ कर प्रसन्न हो रही है.जबकि कंदरिया महादेव मंदिर में पत्रा को देख-पढ़ कर मधुरता से मुस्कराती हुई नारी उत्खचित है. पत्र पढ़कर चिन्तन में डूबी हुई नारी , उदासी से ग्रस्त , आंसू पोंछती हुई , आंखें बंद किए अथवा सप्रयास पत्र देखती हुई नारी का अत्यंत भावपूर्ण तथा कलात्मक अंकन है. एक नारी बायां हाथ अपने वक्ष पर रखी और दायें हाथ में पत्र रखी हुई अंकित है. मानों वह पत्र पढ़ने के लिए अपना हाथ अपने वक्ष के मध्य रखी हुई हो. एक अन्य नारी दायें हाथ में कलम तथा बायें हाथ में पुस्तक थामी हुई दर्शाई गई है. मूर्तियों में कला की प्रचुरता को ध्यान में रखते हुए यह माना जा सकता है कि किसी कला-पुस्तक का अध्ययन-मनन कर रही है. 
अपने बायें हाथ में पत्र तथा दायें हाथ में कलम पकड़कर पत्र लिखती हुई नारी प्रतिमा का एक से अधिक मंदिरों में सुन्दर अंकन है.  इस मुद्रा में वह सोचती हुई दर्शाई गई है कि पत्र में क्या लिखना है ? या फिर वह कविता की कोई पंक्ति लिखने जा रही हो. इसी विचारपूर्ण मुद्रा में एक अन्य स्त्री को पत्रा के विषय पर आंख मूंद कर चिन्तन करते हुए दिखाया गया है.
    दूलादेव मंदिर में एक नारी को दायें हाथ में लेखन के लिए कागजों का पुलन्दा थामें हुए दिखाया गया है. वह बायें हाथ में कलम पकड़कर उसे अपने होठों के मध्य दबा कर विचार करती हुई अंकित है. यह मुद्रा किसी नृत्य मुद्रा के समान आकर्षक है. इस प्रकार मूर्तिकला में भावमुद्राओं का कलात्मक प्रदर्शन अद्वितीय है.
        खजुराहो मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई मिथुन मूर्तियों के लिए विख्यात है किन्तु और भी बहुत कुछ है मंदिरों की दीवारों पर, इसे मूर्ति-लिपि कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन मूर्तियों के जरिए चंदेलों ने अपने समय को पूरी समग्रता के साथ दर्ज़ कर के भविष्य के लिए एक धरोहर के रूप में रख छोड़ा है । इस मूर्ति-लिपि को पढ़ने के लिए आवश्यकता है तो मात्र उस दृष्टि की जो खजुराहो को लेकर काम-संवेगों के पूर्वाग्रह से मुक्त हो। क्योंकि इस मूर्ति-लिपि में शिक्षा संबंधी ज्ञान भी मौजूद है। स्त्री-शिक्षा को प्रदर्शित करती ये प्रतिमाएं तत्कालीन स्त्रियों की बौद्धिक क्षमता को भी रेखांकित करती हैं.