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शनिवार, सितंबर 17, 2011

भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर

- डॉ. शरद सिंह

     त्तर प्रदेश में लखनऊ से सीतापुर मार्ग पर लखीमपुर खीरी से लगभग 12 कि.मी. दूर ओएल कस्बा है. यहां भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर स्थित है. लखीमपुर खीरी लखनऊ संभाग के अतंर्गत लखनऊ से उत्तर-पूर्व में स्थित है. यह जनपद पश्चिम में शाहजहांनपुर तथा पीलीभीत, पूर्व में बहराईच, तथा दक्षिण में हरदोई जिले की सीमाओं को स्पर्श करता है. इसी जिले में दुधुवा राष्ट्रीय उद्यान भी है जिसे देखने प्रति वर्ष सैंकड़ों पर्यटक आते हैं. ये पर्यटक ओयल भी अवश्य जाते हैं. ओयल का जितना पर्यटन की दृष्टि से महत्व है उतना ही धार्मिक दृष्टि से भी महत्व है. लखीमपुर खीरी जिले में कुल छः कस्बे हैं जिनमें से एक है ओयल.  
         अतीत में ओयल कस्बा प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्य क्षेत्र का एक हिस्सा था. नैमिषारण्य और हस्तिनापुर मार्ग में पड़ने वाला कस्बा अपनी कला, संस्कृति तथा समृद्धि के लिए विख्यात था. ओयल शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था. ओयल के शासक भगवान शिव के उपासक थे. ओयल कस्बे के मध्य में स्थित मेंढक मंदिर पर आधारित प्राचीन शिव मंदिर अद्भुत है. 
ओयल का मेंढक मंदिर
                            
        मेंढक मंदिर देश में अपने ढंग का अकेला और अनोखा मंदिर है. मेंढक एक ऐसा उभयचर प्राणी है जो वर्षा होने की सूचना देता है. अतः इसे वृष्टि एवं अनावृष्टि से संबंध माना जाता है. यह माना जाता है कि राज्य को सूखे तथा बाढ़ की प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया गया. अतीत में यह कस्बा नैमिषारण्य क्षेत्रा का एक हिस्सा था. नैमिषारण्य वही प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है जहां दधीचि ने अपनी अस्थियां देवताओं को प्रदान की थीं. अतः यह सम्पूर्ण क्षेत्र प्राचीनकाल से धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्रियाकलापों का केन्द्र रहा है.
ओयल के मेंढक मंदिर का शिखर
    ओयल शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था. और यहां के शासक भगवान शिव के उपासक थे. ओयल कस्बे के मध्य में स्थित मंडूक यंत्र पर आधारित प्राचीन शिव मंदिर इस कस्बे की ऐतिहासिक गरिमा को प्रमाणित करता है. ग्यारहवीं शती के बाद से यह क्षेत्रा चाहमान शासकों के आधीन रहा. 19 वीं सदी के प्रारम्भ में चाहमान वंश के तत्कालीन यशस्वी राजा बख्श सिंह ने जन कल्याण की भावना से प्रेरित हो कर इस अद्भुत मंदिर का निर्माण कराया. मंदिर की वास्तु परिकल्पना कपिला के एक महान तांत्रिक ने की थी. तंत्रवाद पर आधारित इस मंदिर की वास्तु संरचना अपनी विशेष शैली के कारण ध्यान आकृष्ट करती है.
      
मंदिर के आधार पर विशालकाय मेंढक-आकृति
               ओयल में विशालकाय मेंढक मंदिर प्राचीन तांत्रिक परम्परा का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं. मेंढक मंदिर अड़तीस मीटर लम्बाई, पच्चीस मीटर चौड़ाई में निर्मित एक मेढक की पीठ पर बना हुआ है. पाषाण निर्मित मेंढक का मुख तथा अगले दो पैर उत्तर की दिशा में हैं. मेंढक का मुख 2 मीटर लम्बा, डेढ़ मीटर चौड़ा तथा 1 मीटर ऊंचा है.  इसके पीछे का भाग 2 मीटर लम्बा तथा 1.5 मीटर चौड़ा है. पिछले पैर दक्षिण दिशा में दिखाई हैं. मेंढक की उभरी हुई गोलाकार आंखें तथा मुख का भाग बड़ा जीवन्त प्रतीत होता है. मेंढक के शरीर का आगे का भाग उठा हुआ तथा पीछे का भाग दबा हुआ है जोकि वास्तविक मेंढक के बैठने की स्वाभविकमुद्रा है.                                  
       ग्यारहवीं सदी की तांत्रिक संरचनाओं में अष्टदल कमल का बहुत महत्व रहा है.  ओयल इस मंदिर ही अष्टदल कमल को विशेष महत्व दिया गया है. मंदिर का आधार भाग अष्टदल कमल के आकार का बना हुआ है. 
मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग
 मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर तथा दूसरा द्वार दक्षिण की ओर है. मंदिर में काले-स्लेटी पाषाण का भव्य शिवलिंग है. जो श्वेत संगमरमर की 1 मीटर उंचाई तथा 0.7 मीटर व्यास की दीर्घा में गर्भगृह के मध्य स्थित है. इस शिवलिंग को भी कमल के फूल पर अवस्थित किया गया है. इसके समीप उत्तर-पूर्व कोने पर श्वेत संगमरमर की निर्मित नंदी वाहन की प्रतिम है. मंदिर के अंदर से सुरंग मार्ग है. जो मंदिर के प्रांगण के बाहर पश्चिम की ओर खुलता है.यह आज भी प्रयोग में लाया जाता है. अनुमान है कि प्राचीन काल में इस सुरंग मार्ग से राज परिवार तथा विशिष्ट पुजारी गण आते-जाते रहे होंगे. मंदिर का विशाल प्रांगण में जिसके मध्य यह मंदिर निर्मित है लगभग 100 मीटर का वर्गाकार है. मंदिर का निर्माण वर्गाकार जगती के उपर किया गया है. मंदिर के उपर तक जाने के लिए चारो तरफ सीढ़ियां बनी हैं. सीढ़ियों द्वारा भक्त उस धरातल पर पहुंचता है जहां से उसे आठ कोणीय सतह के उपर जाने का मार्ग मिलता है. इस कोण के बाद अष्टदल कमल की अर्द्धवृत्ताकार पंखुड़ियों को पार कर तीन वृत्ताकार सीढ़ियों के बाद अष्टकोणीय धरातल है. यहां पर चतुष्कोणीय गर्भगृह है.
          मंदिर का निर्माण ईंटों और चूने के गारे से किया गया है. इसमें सबसे नीचे एक विशाल मेंढक का निर्माण किया गया है. उसके ऊपर पांच मीटर उंची जगती बनाई गई है. जिसके चारो तरफ पांच सीढ़ियां हैं. मंदिर की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, साधु-संतों और योगियों की विभिन्न मुद्राओं में प्लास्टर निर्मित मूर्तियां हैं. सबसे ऊपर मंदिर का गुम्बदाकार शिखर है. मंदिर के चारो कोनों पर चार अन्य छोटे मंदिर निर्मित किए गए हैं. ये मंदिर भी वास्तु संरचना में अष्टकोणीय हैं. किसी भी छोटे मंदिर में देव मूर्ति की स्थापना नहीं की गई है. मंदिर का भीतरी भाग दांतेदार मेहराबों, पद्म पंखुड़ियों , पुष्प पत्र अलंकरणों से चित्रांकित है. मंदिर के मुख्य गर्भगृह में सहस्त्र कमल दलों से अलंकृत सफेद संगमरमर की दीर्घा है. मंदिर के चारो ओर लगभग 150 मीटर वर्गाकार में चहारदीवारी निर्मित है.
          मंदिर की दीवारों पर तथा चारो कोनों पर बने लघु मंदिरों की दीवारों पर शिव साधना में रत अनेक आकृतियां उत्कीर्ण हैं. इनमें खड्ग धारिणी देवी चामुण्डा, मोरनी पर आरूढ़ चार शीश वाले देवता तथा आत्म-बलि के दृश्य बने हुए हैं. चार सिर वाले देवता का चौथा सिर मुख्या सिर के ठीक ऊपर बनाया गया है. इनके ठीक पीछे एक अन्य देवता विराजमान हैं. आत्म-बलि का दृश्य अद्भुत है. इसमें एक स्त्री को करवट लेटे हुए एक पुरूष के शरीर पर बैठे हुए दिखाया गया है. वह स्त्री अपने दाएं हाथ में धारदार हथियार रखे हुए है तथा उसके बाएं हाथ में उसका कटा हुआ सिर है जिसका मुख खुला हुआ है. कटी हुई गरदन से रक्त की धार निकल कर खुले हुए मुख में गिर रही है. मूलतः यह स्व-रक्तपान का दृश्य है जो तांत्रिक अनुष्ठान की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है. उस स्त्री के दोनों पार्श्व में सेविकाएं खड़ी हुई हैं  जो इस तांत्रिक क्रिया की साक्षी एवं सहयोगिनी हैं.
मंदिर की बाहरी दीव
    जिन विशालकाय ताखों में तांत्रिक क्रियाओं वाली मूर्तियों को प्रदर्शित किया गया है वे बेल-बूटे के सुन्दर अंकनों से सुसज्जित हैं. मंदिर की भीतरी दीवारों को भी सुंदर बेल-बूटों से सजाया गया है.  मंदिर की जगती पर पूर्व की ओर लगभग 2 फुट व्यास का एक कुआं बना हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि इस कुए का जल-स्तर भूतल के समानांतर है. मंदिर के उत्तर में 2 की.मी. लम्बा और 1 कि.मी. कुण्ड है जो संभवतः भक्तजन के स्नान के लिए बनाया गया होगा.
           यूं तो देश के अनेक स्थान पर तंत्रवाद से संबंधित मंदिर एवं प्रतिमाएं पाई जाती हैं जिनमें चौसठ योगिनियों के मंदिर प्रमुख हैं किन्तु मांडूक तंत्रपर आधारित यह मेंढक मंदिर अद्वितीय है.

रविवार, अगस्त 28, 2011

गुरुवार, अगस्त 18, 2011

बुधवार, जुलाई 20, 2011

कोणार्क का काला पगोडा और महाबलीपुरम का सप्त पगोडा

कोणार्क की नारी प्रतिमा
- डॉ.शरद सिंह 

क्या है ‘पगोडा’ ?

भाषाशास्त्रियों के अनुसार ‘पगोडा’ शब्द  संस्कृत के ‘दगोबा’ शब्द का अपभ्रंश रूप है। बर्मी ग्रंथों में पगोडा  शब्द का उद्भव लंका  की भाषा सिंहल  के शब्द ‘डगोबा’ से माना गया है जो मूलतः संस्कृत शब्द है। ‘डगोबा’ का अर्थ है ‘पवित्र अवशेषों की स्थापना का स्थल’। इन्हें ‘स्तूप’ भी कहा गया।
     पगोडे पिरामिड आकार के, गुंबदीय अथवा बुर्ज की आकार के बनाए जाते थे।भारत में पगोडे मंदिरों के द्वार पर अथवा मुख्य मूर्तिस्थल के ऊपर बनाए गए। 
    बौद्ध पगोडे महात्मा बुद्ध तथा बौद्ध धर्म में प्रचलित मान्यताओं के अनुरूप स्मृति-स्थल के रूप में निर्मित हुए जबकि हिन्दू धर्म में हिन्दू मान्यताओं के अनुरूप इन्हें पूजा स्थल अर्थात् मंदिर का रूप मिला।
जुआंगझिओ का लौह पगोडा,चीन

होरयू-जी मंदिर का पगोडा,जापान
पगोडा निर्माण की परम्परा भारत से चीन और चीन से जापान होती हुई सुदूर पूर्व में विकसित होती गई। पगोडा संबंधित देशों के स्थानीय स्थापत्य शिल्प में बनाए गए। ये कई मंजिल के और भिन्न आकार के हो सकते थे।


 (RohitBisht comment on my post 'मिथुन मूर्तियों का रहस्य '  
Nice article,madam please tell me why Kornak Temple is called as 'Black Pagoda'? This is a Sun temple,has it shape like Pagoda of south east asia? similar question arise for Sapt Pagoda of Mahabalipuram. (Friday, July 15, 2011 3:00:00 PM) )

कोणार्क का ब्लैक पगोडा

कोणार्क का रथमंदिरः काला पगोडा
कोणार्क के सूर्य मंदिर को ब्लैक पगोडा भी कहा जाता है। यह  भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी नामक शहर में स्थित है। इसे लाल बलुआ पत्थर एवं काले ग्रेनाइट पत्थर से 12361264 ई.पू. में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। इसे युनेस्को द्वारा सन 1984 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर सूर्य देव (अर्क) के रथ के रूप में निर्मित है। मंदिर एक विशाल पत्‍थर के रथ का स्‍वरूप लिए हुए है । ऐसा लगता है जैसे किसी विशाल मंदिर रूपी रथ को आसमान के पार  खींचा जा रहा हो ।  
       
   रथ-मंदिर के बारह पहिये बारह महीनों के प्रतीक हैं और इसके पहिये की सोलह तीलियां दिन के समय का प्रतीक हैं । इस को पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बहुत ही सुंदर बनाया गया है। संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया है। मंदिर में खजुराहो की तरह मिथुन मुद्राओं वाली मूर्तियां भी हैं।
      काले ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित होने के कारण कोणार्क के सूर्य मंदिर को ब्लैक पगोडा भी कहा जाता है।

महाबलीपुरम का सप्त पगोडा

महाबलीपुरम के रथ मंदिर अर्थात् सप्त पगोडा
         दक्षिण भारत में महाबलीपुरम अथवा मामल्लपुरम में स्थित  
‘सप्त पगोडा’ महाभारत महाकाव्य के पांडव भाइयों के रथों के रूप में निर्मित है। महाबलीपुरम् की वास्‍तुकला की तीन प्रमुख शैलियों का सम्‍बंध राजा मामल्‍य, उनके बेटे नरसिंह वर्मन और राजसिंह के शासन काल से है । महाबलीपुरम् की शैली सबसे प्राचीन और सरल है जो चट्टान को काटकर बनाये गये मंदिरों में पायी जाती है । लगभग 8 वीं तथा उसके बाद नरसिंहवर्मन और राजसिंह काल में ग्रेनाइट पत्‍थर के शिला-खंडों से मंदिरों का निर्माण किया गया था ।
विष्णु प्रतिमा, मामल्लपुरम
    मामल्ल शैली का विकास नरसिंह वर्मन प्रथम के काल में हुआ। इसके अन्तर्गत रथ मंदिरों का निर्माण किया गया। ये मंदिर मामल्लपुरम में हैं। रथ मंदिर में द्रौपदी रथ सबसे छोटा है। इसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं है। धर्मराज रथ के रथ मंदिर पर नरसिंह वर्मन की मूर्ति अंकित है। ग्रेनाइट पत्‍थर के पत्थरों से बनाए जाने तथा सात की संख्या में होने के कारण इन रथों को 'सप्त पगोडा' भी कहा जाता है। सप्त पगोडा के अन्तर्गत निम्नलिखित रथ बनें- 'धर्मराज रथ', 'भीम रथ', 'अर्जुन रथ', 'सहदेव' रथ, 'गणेश' रथ, 'वलैयकुट्ई' रथ और 'पीदरी' रथ। 
       कोणार्क का सूर्य मंदिर अर्थात् ब्लैक पगोडा और महाबलीपुरम का सप्त पगोडा भारतीय शिल्प एवं स्थापत्य कला की कालजयी धरोहर हैं।

मंगलवार, जून 28, 2011

मलीहाबादी आमों की बहार ...

मलीहाबाद में आमों की सब से अधिक किस्में पैदा करके 
पद्मश्री हाजी कलीमुल्लाह खान साहब 
 (Grafting expert and Padmashree horticulturist Haji Kaleemullah Khan) 
ने ऐतिहासिक काम किया है......


मलीहाबादी आमों की बहार देखने के लिए कृपया क्लिक करें -


video


मेरे इस वीडियो को You Tube पर भी देखा जा सकता है -


                        

बुधवार, जून 15, 2011

मिथुन मूर्तियों का रहस्य

- डॉ.शरद सिंह

      खजुराहो, वहां स्थित मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई मिथुन मूर्तियों के लिए विख्यात है। यह प्रश्न बार-बार उठता रहा है कि मंदिर भित्तियों पर ऐसी मूर्तियां क्यों उकेरी गईं ? पूजा-अर्चना स्थल पर ऐसी मूर्तियों का क्या औचित्य है ? मंदिर अथवा कोई भी उपासना स्थल वह स्थान होता है जहां पहुंच कर मनुष्य लौकिक से अलौकिक की ओर आकर्षित होता है, तो फिर काम-क्रीड़ा रूपी लौकिक क्रियाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन क्यो ?
       इन सारे प्रश्नों का उत्तर आज भी पूर्णरूप से स्पष्ट नहीं हो सका है। खजुराहो की मिथुन मूर्तियों को ले कर विभिन्न विचार एवं मत प्रचलित हैं।
कैलाश मंदिर, एलोरा
       
       खजुराहो की भांति उड़ीसा तथा मध्य भारत के कुछ अन्य स्थानों पर भी मिथुन मूर्तियों का चित्रण है। कोणार्क के अतिरिक्त कर्नाटक के भत्कल मंदिर में, तमिलनाडु के कामाक्षी अम्बा मंदिर में, महाराष्ट्र एलोरा के कैलाश मंदिर में, आंध्र प्रदेश  आलमपुर के ब्रह्मा मंदिर में मिथुन मूर्तियां मौजूद हैं।
            
कोणार्क मंदिर प्रतिमाएं
      कोणार्क के मंदिर में मिथुन मूर्त्तियाँ उत्कीर्ण हैं। इन सभी मंदिरों और मूत्तियों का निर्माण लगभग उसी युग में हुआ जब खजुराहो के मंदिर एवं मूर्तियां निर्मित हुयीं। तुलनात्मक दृष्टि से खजुराहो का मूर्ति शिल्प इन सभी से श्रेष्ठ है। इसकी श्रेष्ठता को स्थापित करने वाला तत्व है इसकी सौन्दर्यात्मकता। उड़ीसा के मंदिरों में रथ और अश्व के अंकन को छोड़कर शेष मूर्तियों में खजुराहो की मूर्तियों की अपेक्षा स्थूलता है। इन मंदिरों की नारी मूर्तियों में कमनीयता, लावण्य, अलंकरण की सूक्ष्मता तथा सम्प्रेषणीयता की अपेक्षाकृत कमी है। इसी प्रकार मिथुन मूर्तियों में पौराणिक आख्यान है, कला की पुरातन एवं समसामयिक अवधारणायें हैं, तथा सौन्दर्य के विकसित आयाम से चरम विकसित आयाम हैं।
  युगल प्रतिमा, खजुराहो
     
    खजुराहो की मिथुन मूर्तियां मंदिर भित्ति पर अपने उत्खचन को एक विशिष्ट अवधारणा प्रदान करती हैं। इसका वज्र यान, तंत्रयान अथवा किसी भी वैचारिक आधार से आकलन किया जाए यह अवधारणा एक मत से उद्घाटित होती है कि समस्त सांसारिकता के निर्वहन के बाद ईश्वर की प्राप्ति संभव है। मिथुन मूर्तियां मंदिरों में उत्खचित अन्य मूर्तियां की अपेक्षा कम संख्या में हैं किन्तु अपनी कलात्मक जीवन्तता के कारण समूचे विश्व के कला-शिल्प प्रेमियों का ध्यान आकर्षित करती हैं। इस प्रकार की मूर्तियां लक्ष्मण मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, जगदम्बा मंदिर तथा कंदरिया महादेव जैसे पश्चिमी समूह के मंदिरों तथा दक्षिणी समूह में दूलादेव मंदिर की बर्हिभित्तियों पर मिथुन मूर्तियां का सुन्दर एवं जीवन्त अंकन है। मिथुन मूर्तियों के मंदिर भित्तियों पर प्रदर्शन को लेकर विद्वानों में सदैव मतभेद रहा है। कुछ विद्वान उन्हें तत्कालीन सामाजिक विच्श्रृंखलता का प्रतीक मानते हैं। कुछ विद्वान इन्हें तांत्रिक विधान से जोड़ते हैं तो कुछ जीवन से मृत्यु (मोक्ष) तक की क्रमिक क्रियाओं का प्रदर्शन मानते हैं।
ब्रह्मा मंदिर, आलमपुर
         
   हिन्दू जीवन-व्यवस्थाओं में चार पुरुषार्थों-अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष में काम को भी अन्य तीन पुरुषार्थों के समकक्ष महत्वपूर्ण माना गया है। खजुराहो में प्रदर्शित मिथुन मूर्तियों सृजन हेतु काम को प्रदर्शित करती हैं जिससे इनके तन्त्र मार्ग से प्रभावित होने का भ्रम होने लगता है। मिथुन मूर्तियां में प्रदर्शित कामकला की विविध पद्धतियां एवं आसन यह प्रदर्शित करते है कि मनुष्य अपने जीवन से पूर्ण तृप्ति के बाद ही आध्यात्म की ओर प्रवृत हो सकता है तथा मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
कैलाश मंदिर, एलोरा
          खजुराहो में प्रदर्शित मिथुन मूर्तियों में जिन आसनों का अंकन है उनका उल्लेख प्राचीन ग्रंथ ‘कामसूत्र’ में मिलता है। जिनमें भुग्नक, व्यायत, अवलम्बितक, धेनुक, संघाटक, गोयूथिक तथा अघोरत आदि का अंकन शिल्प सौन्दर्य की दृष्टि से अनुपम है। इनकी अन्तक्रियाओं को भी शिल्पियों ने सहज भाव से प्रस्तुत किया है। उदाहरणार्थ, धेनुक की अन्तक्रियाए हारिणबन्ध, छागल, गर्दभाक्रान्त, मार्जारललिततक आदि का प्रदर्शन विविध मूर्तियों में है।
          लक्ष्मण मंदिर की बहिर्भित्तियों पर रतिक्रिया में लिप्त युगल, मुख मैथुन, गोयूथिक (सामूहिक रतिक्रिया) तथा पशु-संभोग का उत्खचन है। इसी प्रकार दूलादेव मंदिर में मुखमैथुन, देवी जगदम्बा मंदिर में पशु आसन तथा लक्ष्मण मंदिर में गोयूथिक चित्रण प्रदर्शित किया गया है। लक्ष्मण मंदिर की बर्हिभित्ति पर अधोरत युगल के निकट एक उन्मत्त गज का अंकन है जो अपनी सूंड में एक पुरुष की टांगों को लपेटे हुए है और अपने आगे के दायें पैर को उठाकर उस पुरुष के सिर को रौंदने को तत्पर है। इसी मंदिर में उत्कीर्ण एक अन्य प्रतिभा में व्यायत युगल की बायीं ओर एक नारी तथा दायीं ओर एक पुरुष अनुचर प्रदर्शित है। ये दोनों युगल की क्रीड़ा से प्रभावित हो आत्मरति में संलग्न हैं। नीचे एक अन्य सेविका बैठी हुई है। इस प्रतिमा में मानवीय संवेग के संचरण का व्यावहारिक प्रदर्शन है। इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर में ही गोयूथिक एवं पशु संभोग चित्रण में एक-एक अनुचरों को अपने हाथों से अपने दोनों नेत्र बंद किए हुए दिखाया गया है। संभवतः संवेग संचरण से बचने के लिए यह आचरण प्रदर्शित है क्योंकि अन्य अनुचर सहयोगी की भूमिका में हैं।
नारी प्रतिमा, खजुराहो
         
      इस प्रकार खजुराहो के मूर्ति शिल्प में जहाँ शिल्पगत आनुपातिक सौष्ठव का सुन्दर प्रदर्शन है वहीं संवेगों की विस्तृत एवं वैविध्यपूर्ण प्रस्तुति है। काम-भावना का यथार्थ एवं सूक्ष्म चित्रण खजुराहो की अपनी कलात्मक विशिष्टता है। यह हिन्दू मंदिरों में प्रदर्शित है किन्तु यह भी संभावना प्रकट की जा चुकी है कि जैन मंदिर समूह के शांतिनाथ मंदिर में भी मिथुन मूर्तियों का अंकन रहा होगा। शांतिनाथ मंदिर में द्वार स्तम्भों पर उत्कीर्ण मूर्तियां (खण्डित अवस्था में) तथा मंदिर के परकोटे में स्थित अन्य मंदिरों की मिथुन मूर्तियों से प्रतीत होता है कि जैन मंदिरों में भी मिथुन मूर्तियां रही होंगी जो कि कालान्तर में वैराग्यवादी परम्परा के विरूद्ध होने के कारण खण्डित कर दी गई।


 भत्कल मंदिर, कर्नाटक
          प्रत्येक शिल्प अपने समय की स्थितियों, परम्पराओं वैचारिक एवं प्रचलित प्रतिमानों को प्रदर्शित करता है। मंदिर भित्तियों पर मिथुन मूर्तियों का सार्वजनिक प्रदर्शन काम रूपी पुरुषार्थ के प्रति तत्कालीन समाज के विस्तृत दृष्टिकोण का परिचायक भी माना जा सकता है। इसे पशु, पक्षी, मनुष्य सभी में समान रूप से स्वाभाविक क्रिया के रूप में ग्रहण करते हुए जीवन की पूर्णता (तदोपरान्त मोक्ष) आवश्यक तत्व का स्थान दिया गया है। खजुराहो शिल्प के पूर्व भी मिथुन अथवा युगल चित्रण किए गए। शुंगकालीन मृण्यमूर्तियों एवं पाषण मूर्तियों में युगल चित्रण अमरावती एवं मथुरा में है। इसके पूर्व वैदिक युग के विभिन्न ग्रंथों में शिव-शक्ति, पुरुष-प्रकृति, आत्मा-परमात्मा आदि के रूप में इसी भावना का उल्लेख हुआ है।
रात्रिदेवी, बेबीलोनिया
          
     मंदिरों की बहिर्भित्तियों पर इस प्रकार का प्रदर्शन आधुनिक समाज में आश्चर्य उत्पन्न करता है किन्तु मंदिरों और यौनाचार का पारस्परिक संबंध प्राचीनतम है। बेबीलोनिया के मिलित्ता मंदिर में प्रत्येक विवाहिता को एक बार जाकर विदेशी के साथ कुछ घंटे व्यतीत करने को होते थे। 
अफ्रोदीती मंदिर मूर्ति, ग्रीस

         इसी प्रकार ग्रीक अफ्रोदीती और रोमन वीनस के चारों ओर गणिकाओं के आवास होते थे। भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा भी चंदेलकाल से पुरातन है। कालिदास ने महाकाल की चरणधारिणी नर्त्तकियों का उल्लेख किया है।  किन्तु, छठीं शताब्दी ईसवी में नग्न नारी मूर्तियों का उत्खचन तो किया जाता था लेकिन मिथुन चित्रण का अभाव था। वज्रयान उदय यानी छठीं शताब्दी के निकट तांत्रिक परिपाटी का विकास हुआ और साधना का केन्द्र नारी को बनाया गया। शाक्त धर्म में भी भोग द्वारा तंत्र सिद्ध करने की परिपाटी रही। विन्ध्याचल में नग्न कुमारी की पूजा प्रमुख अनुष्ठान था। औघड़, सहजिया, मरमिया आदि कापालिक पंथ तंत्र ज्ञान का प्रसार करते रहे। इस प्रकार की परिपाटियों ने मंदिर में मिथुनमूर्तियाँ के उत्खचन को सहज सार्वजनिक होने में मदद की होगी।                  
         मिथुन मूर्तियों को चाहे तंत्राचार का उदाहरण माना जाए अथवा काम-पुरुषार्थ द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग की अभिव्यक्ति किन्तु तथ्य निर्विवाद सिद्ध है कि इनमें शिल्प सौंदर्य का इतना सुन्दर प्रदर्शन है कि ये मूर्तियां संवेगों से युक्त एवं जीवन्त प्रतीत होती हैं। 

बुधवार, अप्रैल 27, 2011

प्राचीन भारत में स्त्रियों के प्रति समाज का दृष्टिकोणः भाग-पांच

- डॉ. शरद सिंह

    चंदेल काल की सबसे बड़ी उपलब्धि है खजुराहो के मंदिर। ये मंदिर  चंदेल कालीन स्त्रियों की स्थिति पर समुचित प्रकाश डालते हैं। इनका निर्माण सन 950 ईस्वी से 1250 ईस्वी के मध्य किया गया। यही काल चंदेलकाल माना गया है 

     1- तत्कालीन स्त्रियों को गायन वादन और नृत्य कला को सीखने की पूरी छूट थी। खजुराहो के वामन मंदिर में एक स्त्री को लम्बा इकतारा बजाती हुई उत्कीर्ण किया गया है। वहीं विश्वनाथ मंदिर में बांसुरी बजाती हुई स्त्री का सुंदर शिल्पांकन है।

     2- चंदेलकालीन स्त्री को पढ़ने-लिखने का अधिकार था। इसके प्रमाण प्रतिमाओं में मिलते हैं । खजुराहो की मूर्तियों में पत्र पढ़कर चिन्तन में डूबी हुई स्त्री उदासी से ग्रस्त आंसू पोंछती हुई आंखें बंद किए अथवा सप्रयास पत्र देखती हुई स्त्री का अत्यंत भावपूर्ण तथा कलात्मक अंकन है। एक स्त्री बायां हाथ अपने वक्ष पर रखी और दायें हाथ में पत्र रखी हुई अंकित है। मानों वह पत्र पढ़ने के लिए अपना हाथ अपने वक्ष के मध्य रखी हुई हो। एक अन्य स्त्री दायें हाथ में कलम तथा बायें हाथ में पुस्तक थामी हुई दर्शाई गई है। खजुराहो के विश्वनाथ मंदिर में एक स्त्री को कागजों के पुलन्दे सहित दिखाया गया है। वह सामने खड़े पुरुष को कुछ समझा रही है। इसी मंदिर के अन्य दृश्य में एक स्त्री पुस्तक रख कर गुरु से पढ़ती हुई दिखाई गई है। अपने बायें हाथ में पत्र तथा दायें हाथ में कलम पकड़कर पत्र लिखती हुई स्त्री प्रतिमा का एक से अधिक मंदिरों में सुन्दर अंकन है। इस मुद्रा में वह सोचती हुई दर्शाई गई है कि पत्र में क्या लिखना है।


      3- खजुराहो मूर्तिकला में कई ऐसे दृश्य हैं जो सिद्ध करते है कि तत्कालीन स्त्रियों में शस्त्र विद्या के प्रति अभिरूचि थी। आत्मरक्षा एवं शिकार के उद्देश्य से वे शस्त्र धारण करती थी। कंदरिया महादेव एवं जगदम्बा मंदिर के आधार फलक पर एक स्त्री को ऐसा भाला रखे हुये दिखाया गया है जिसके एक सिरे पर तीन पत्तियों के आधार का धारदार चाकू जुड़ा हुआ है। वामन मंदिर में एक स्त्री को परशु धारण  किये हुये तथा एक अन्य स्त्री को धनुषबाण सहित प्रदर्शित किया गया है। इस स्त्री के बायें हाथ में धनुष है। जिस पर दायें हाथ से उसने धनुष पर तीर चढ़ाया हुआ है। तथा वह तीर छोड़ने को तत्पर है। उसके कंधे पर तरकश बंधा हुआ है। जिसमें कुछ अन्य तीर रखे हुये है।  दूलादेव मंदिर में एक स्त्री हाथ में चाकू लेकर आक्रमण करने को तत्पर दिखायी गयी है। एक अन्य प्रतिमा में एक स्त्री को बड़ी तलवार थामे हुये दिखाया गया है। अपने दायें हाथ से उसने तलवार की नोंक पकड़ रखी है।



       4- खजुराहो की मंदिर भित्तियों पर गोष्ठी एवं मंत्रणा के कई दृश्य अंकित हैं। जिनसे पता चलता है कि गोष्ठी एवं मंत्रणाओं में स्त्री और पुरूषों दोनों की सहभागिता होती थी। 



      5- खजुराहो की मंदिर भित्तियों के कुछ दृश्यों में स्त्रियों को गेंद खेलते दिखाया गया है। लक्ष्मण मंदिर में एक स्त्री दायें हाथ से बायें हाथ में गेंद उछाल रही है। वह पीछे की ओर से गेंद उछालने के प्रयास में है। इसी प्रकार के दृश्य जगदम्बा मंदिर  लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया महादेव मंदिर की भित्तियों पर भी है। इनमें एक दृश्य ऐसा भी है जिसमें एक स्त्री एक छोटे बालक के साथ है। वह बालक उसके पैरों के पास बैठकर गेंद लपकने को तत्पर है।



      6- चंदेलकाल में स्त्रियों को चित्रकला में अभिरुचि संवारने का पर्याप्त अवसर दिया गया। खजुराहो मंदिर भित्ति पर एक स्त्री को दर्शकों की ओर पीठ कर के दायें हाथ से चित्र बनाती हुई दर्शाया गया है। उसका दायां हाथ सिर ऊपर उठा हुआ है। एक अन्य दृश्य में एक स्त्री दर्शकों की ओर पीठ कर के दीवार पर चित्र बना रही है। इस दृश्य में उस स्त्री के द्वारा बनाए गए वृक्ष की शाखाएं भी स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। पार्श्वनाथ मंदिर में अपने बायें हाथ में रंगों का पात्र लिए तथा दायें हाथ से चित्रा बनाती हुई स्त्री प्रतिमा है।

             
     7- इस काल में स्त्रियों को सज-संवर कर सार्वजनिक उत्सवों में शामिल होने का अधिकार था। सौंदर्य प्रसाधनों में पाउडर (मुखचूर्ण), लिपिस्टिक (अधरराग), काजल, सिंदूर, इत्र आदि का प्रचलन था। भांति-भांति की हेयरस्टाईल्स (केशसज्जा) की जाती थी।
       स्मृतिकाल से निरन्तर कम होते जा रहे अधिकारों की अपेक्षा चंदेलकालीन समाज में स्त्रियों को अधिक सम्मान तथा अधिकार प्राप्त था। इसका एक कारण जो मैंने अपने शोधकार्य के दौरान अनुभव किया कि चंदेल समाज पर स्मृतियों का नहीं बल्कि वेदों और पुराणों के उन तत्वों का प्रभाव था जो समाज को एक वृहद सुलझा हुआ दृष्टिकोण देते हैं। ये तत्व थे - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।


संदर्भः-



                      








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खजुराहो  से संबंधित मेरे द्वारा लिखा गया नाटक नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है-



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रविवार, अप्रैल 17, 2011

प्राचीन भारत में स्त्रियों के प्रति समाज का दृष्टिकोणः भाग-चार

- डॉ. शरद सिंह


          गुप्तोत्तर काल

     गुप्तोत्तर काल में 12-13 वीं शती तक स्त्रियों की स्थिति में तेजी से गिरावट आई। इस समय परस्पर दो विपरीत स्थितियां मौजूद थीं। एक ओर चंदेल राजवंश था जिसमें स्त्रियों के सामाजिक अधिकार बहुप्रतिशत थे जबकि दूसरी ओर राजपूत राजवंशों में स्त्रियों के सामाजिक अधिकारों में तेजी से कटौती होती जा रही थी। फिर भी 11वीं-12वीं शती तक स्वयंवर द्वारा पति चुनने का अधिकार राजवंश की स्त्रियों को था, कालान्तर में वह भी छिन गया।
1-     गुप्तोत्तर काल में ही राजपूतों में पर्दा प्रथा आरंभ हुई  जिसका प्रभाव अन्य द्विज जातियों पर भी पड़ा था। इस प्रथा ने स्त्रियों के अधिकारों को अत्यंत सीमित कर दिया। स्रियों की मर्यादाएं निश्चित कर दी गई।  

2-   बहुविवाह प्रथा तथा रखैल रखने की प्रथा यथावत जारी रही।
3-     बांझ स्रियों को अपने परिवार में तथा समाज में घोर प्रताड़ना सहन करनी पड़ती थी। ऐसी स्रियों को पारिवारिक एवं सामाजिक अवहेलना का शिकार होना पड़ता था।  

4-   कन्या का जन्म अभिशाप माना जाने लगा और कन्या-शिशु को जन्म लेते ही मार देने की निकृष्ट एवं अमानवीय प्रवृति ने समाज में अपनी जड़ें जमा लीं।

5-     विधवाओं पर अनेक तरह के सामाजिक नियम लाद दिए गए। वे श्रृंगार नहीं कर सकती थीं तथा काले या सफ़ेद कपड़े ही पहन सकती थीं। विधवाओं को सन्यास- व्रत के कठोर नियमों का पालन करना पड़ता था।

देवी पूज्य थी, स्त्री
6-   दासी प्रथा यथावत जारी रही।
दासियां वंशानुगत रुप से सेवकों के रुप में अपने स्वामी की सेवा करती थीं। ये दासियां अपने स्वामी की आज्ञा के बिना विवाह नहीं कर सकती थीं। जब कोई दासी विवाह योग्य हो जाती, तो उसे उसके स्वामी के समक्ष उपस्थित होना पड़ता। यदि उसके स्वामी को वह दासी पसंद आ जाती, तो उसका स्वामी उस दासी का विवाह किसी और दास के साथ करा कर दासी को अपनी वासनापूर्ति के लिए रख लेता। इससे दासी के बच्चों को दास का नाम पिता के रूप में मिलता, भले ही वे स्वामी की संतान होते। ये संतानें वंशानुगत दास मानी जातीं।    

देवीः भौरमदेव (छत्तीसगढ़)
       7-     वेश्याओं द्वारा युवा लड़कियों से अनैतिक कार्य कराने के लिए स्त्रियों का क्रय- विक्रय बढ़ गया। वेश्यावृत्ति बढ़ गई।

         8-     स्त्रियों को पूरी तरह से दोयम दर्जे का समझा जाने लगा।

गुप्तोत्तर काल में एक भयावह प्रथा को बढ़ावा मिला, वह थी- जौहर प्रथा। पराजित राजाओं की रानियां एवं दासियां शत्रुओं से बचने के लिए आग में जीवित जल कर आत्महत्या करने लगीं। कई स्त्रियां सामूहिक रूप से भी जौहर करती थीं। इस कुप्रथा को भरपूर महिमामंडित किया जाने लगा।


सती का पंजा (राजस्थ
9-  जौहर प्रथा की भांति सती-प्रथा गुप्तोत्तर काल में तेजी से बढ़ी। जौहर करने वाली स्त्रियों को ‘सती-देवी’ का दर्जा दिया गया ताकि इस  कुप्रथा को बढ़ावा मिले। जौहर करने वाली और सती होने वाली स्त्रियों की स्मृति में चांद, सूरज और हाथ के पंजे बना कर पूजा की जाने लगी।   

10-स्त्रियों की राजनीतिक भागीदारी लगभग समाप्त हो गई।



चंदेल काल में स्त्रियों के सामाजिक अधिकारों की स्थिति अपेक्षाकृत भिन्न थी जिस पर चर्चा अगली कड़ी में रहेगी।