Tuesday, March 27, 2012
Thursday, March 08, 2012
Saturday, September 17, 2011
भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर
- डॉ. शरद सिंह
उत्तर प्रदेश में लखनऊ से सीतापुर मार्ग पर लखीमपुर खीरी से लगभग 12 कि.मी. दूर ओएल कस्बा है. यहां भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर स्थित है. लखीमपुर खीरी लखनऊ संभाग के अतंर्गत लखनऊ से उत्तर-पूर्व में स्थित है. यह जनपद पश्चिम में शाहजहांनपुर तथा पीलीभीत, पूर्व में बहराईच, तथा दक्षिण में हरदोई जिले की सीमाओं को स्पर्श करता है. इसी जिले में दुधुवा राष्ट्रीय उद्यान भी है जिसे देखने प्रति वर्ष सैंकड़ों पर्यटक आते हैं. ये पर्यटक ओयल भी अवश्य जाते हैं. ओयल का जितना पर्यटन की दृष्टि से महत्व है उतना ही धार्मिक दृष्टि से भी महत्व है. लखीमपुर खीरी जिले में कुल छः कस्बे हैं जिनमें से एक है ओयल.
अतीत में ओयल कस्बा प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्य क्षेत्र का एक हिस्सा था. नैमिषारण्य और हस्तिनापुर मार्ग में पड़ने वाला कस्बा अपनी कला, संस्कृति तथा समृद्धि के लिए विख्यात था. ओयल शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था. ओयल के शासक भगवान शिव के उपासक थे. ओयल कस्बे के मध्य में स्थित मेंढक मंदिर पर आधारित प्राचीन शिव मंदिर अद्भुत है.
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| ओयल का मेंढक मंदिर |
मेंढक मंदिर देश में अपने ढंग का अकेला और अनोखा मंदिर है. मेंढक एक ऐसा उभयचर प्राणी है जो वर्षा होने की सूचना देता है. अतः इसे वृष्टि एवं अनावृष्टि से संबंध माना जाता है. यह माना जाता है कि राज्य को सूखे तथा बाढ़ की प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया गया. अतीत में यह कस्बा नैमिषारण्य क्षेत्रा का एक हिस्सा था. नैमिषारण्य वही प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है जहां दधीचि ने अपनी अस्थियां देवताओं को प्रदान की थीं. अतः यह सम्पूर्ण क्षेत्र प्राचीनकाल से धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्रियाकलापों का केन्द्र रहा है.
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| ओयल के मेंढक मंदिर का शिखर |
ओयल शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था. और यहां के शासक भगवान शिव के उपासक थे. ओयल कस्बे के मध्य में स्थित मंडूक यंत्र पर आधारित प्राचीन शिव मंदिर इस कस्बे की ऐतिहासिक गरिमा को प्रमाणित करता है. ग्यारहवीं शती के बाद से यह क्षेत्रा चाहमान शासकों के आधीन रहा. 19 वीं सदी के प्रारम्भ में चाहमान वंश के तत्कालीन यशस्वी राजा बख्श सिंह ने जन कल्याण की भावना से प्रेरित हो कर इस अद्भुत मंदिर का निर्माण कराया. मंदिर की वास्तु परिकल्पना कपिला के एक महान तांत्रिक ने की थी. तंत्रवाद पर आधारित इस मंदिर की वास्तु संरचना अपनी विशेष शैली के कारण ध्यान आकृष्ट करती है.
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| मंदिर के आधार पर विशालकाय मेंढक-आकृति |
ओयल में विशालकाय मेंढक मंदिर प्राचीन तांत्रिक परम्परा का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं. मेंढक मंदिर अड़तीस मीटर लम्बाई, पच्चीस मीटर चौड़ाई में निर्मित एक मेढक की पीठ पर बना हुआ है. पाषाण निर्मित मेंढक का मुख तथा अगले दो पैर उत्तर की दिशा में हैं. मेंढक का मुख 2 मीटर लम्बा, डेढ़ मीटर चौड़ा तथा 1 मीटर ऊंचा है. इसके पीछे का भाग 2 मीटर लम्बा तथा 1.5 मीटर चौड़ा है. पिछले पैर दक्षिण दिशा में दिखाई हैं. मेंढक की उभरी हुई गोलाकार आंखें तथा मुख का भाग बड़ा जीवन्त प्रतीत होता है. मेंढक के शरीर का आगे का भाग उठा हुआ तथा पीछे का भाग दबा हुआ है जोकि वास्तविक मेंढक के बैठने की स्वाभविकमुद्रा है.
ग्यारहवीं सदी की तांत्रिक संरचनाओं में अष्टदल कमल का बहुत महत्व रहा है. ओयल इस मंदिर ही अष्टदल कमल को विशेष महत्व दिया गया है. मंदिर का आधार भाग अष्टदल कमल के आकार का बना हुआ है.
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| मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग |
मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर तथा दूसरा द्वार दक्षिण की ओर है. मंदिर में काले-स्लेटी पाषाण का भव्य शिवलिंग है. जो श्वेत संगमरमर की 1 मीटर उंचाई तथा 0.7 मीटर व्यास की दीर्घा में गर्भगृह के मध्य स्थित है. इस शिवलिंग को भी कमल के फूल पर अवस्थित किया गया है. इसके समीप उत्तर-पूर्व कोने पर श्वेत संगमरमर की निर्मित नंदी वाहन की प्रतिम है. मंदिर के अंदर से सुरंग मार्ग है. जो मंदिर के प्रांगण के बाहर पश्चिम की ओर खुलता है.यह आज भी प्रयोग में लाया जाता है. अनुमान है कि प्राचीन काल में इस सुरंग मार्ग से राज परिवार तथा विशिष्ट पुजारी गण आते-जाते रहे होंगे. मंदिर का विशाल प्रांगण में जिसके मध्य यह मंदिर निर्मित है लगभग 100 मीटर का वर्गाकार है. मंदिर का निर्माण वर्गाकार जगती के उपर किया गया है. मंदिर के उपर तक जाने के लिए चारो तरफ सीढ़ियां बनी हैं. सीढ़ियों द्वारा भक्त उस धरातल पर पहुंचता है जहां से उसे आठ कोणीय सतह के उपर जाने का मार्ग मिलता है. इस कोण के बाद अष्टदल कमल की अर्द्धवृत्ताकार पंखुड़ियों को पार कर तीन वृत्ताकार सीढ़ियों के बाद अष्टकोणीय धरातल है. यहां पर चतुष्कोणीय गर्भगृह है.
मंदिर का निर्माण ईंटों और चूने के गारे से किया गया है. इसमें सबसे नीचे एक विशाल मेंढक का निर्माण किया गया है. उसके ऊपर पांच मीटर उंची जगती बनाई गई है. जिसके चारो तरफ पांच सीढ़ियां हैं. मंदिर की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, साधु-संतों और योगियों की विभिन्न मुद्राओं में प्लास्टर निर्मित मूर्तियां हैं. सबसे ऊपर मंदिर का गुम्बदाकार शिखर है. मंदिर के चारो कोनों पर चार अन्य छोटे मंदिर निर्मित किए गए हैं. ये मंदिर भी वास्तु संरचना में अष्टकोणीय हैं. किसी भी छोटे मंदिर में देव मूर्ति की स्थापना नहीं की गई है. मंदिर का भीतरी भाग दांतेदार मेहराबों, पद्म पंखुड़ियों , पुष्प पत्र अलंकरणों से चित्रांकित है. मंदिर के मुख्य गर्भगृह में सहस्त्र कमल दलों से अलंकृत सफेद संगमरमर की दीर्घा है. मंदिर के चारो ओर लगभग 150 मीटर वर्गाकार में चहारदीवारी निर्मित है.
मंदिर की दीवारों पर तथा चारो कोनों पर बने लघु मंदिरों की दीवारों पर शिव साधना में रत अनेक आकृतियां उत्कीर्ण हैं. इनमें खड्ग धारिणी देवी चामुण्डा, मोरनी पर आरूढ़ चार शीश वाले देवता तथा आत्म-बलि के दृश्य बने हुए हैं. चार सिर वाले देवता का चौथा सिर मुख्या सिर के ठीक ऊपर बनाया गया है. इनके ठीक पीछे एक अन्य देवता विराजमान हैं. आत्म-बलि का दृश्य अद्भुत है. इसमें एक स्त्री को करवट लेटे हुए एक पुरूष के शरीर पर बैठे हुए दिखाया गया है. वह स्त्री अपने दाएं हाथ में धारदार हथियार रखे हुए है तथा उसके बाएं हाथ में उसका कटा हुआ सिर है जिसका मुख खुला हुआ है. कटी हुई गरदन से रक्त की धार निकल कर खुले हुए मुख में गिर रही है. मूलतः यह स्व-रक्तपान का दृश्य है जो तांत्रिक अनुष्ठान की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है. उस स्त्री के दोनों पार्श्व में सेविकाएं खड़ी हुई हैं जो इस तांत्रिक क्रिया की साक्षी एवं सहयोगिनी हैं.
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| मंदिर की बाहरी दीव |
जिन विशालकाय ताखों में तांत्रिक क्रियाओं वाली मूर्तियों को प्रदर्शित किया गया है वे बेल-बूटे के सुन्दर अंकनों से सुसज्जित हैं. मंदिर की भीतरी दीवारों को भी सुंदर बेल-बूटों से सजाया गया है. मंदिर की जगती पर पूर्व की ओर लगभग 2 फुट व्यास का एक कुआं बना हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि इस कुए का जल-स्तर भूतल के समानांतर है. मंदिर के उत्तर में 2 की.मी. लम्बा और 1 कि.मी. कुण्ड है जो संभवतः भक्तजन के स्नान के लिए बनाया गया होगा.
यूं तो देश के अनेक स्थान पर तंत्रवाद से संबंधित मंदिर एवं प्रतिमाएं पाई जाती हैं जिनमें चौसठ योगिनियों के मंदिर प्रमुख हैं किन्तु ‘मांडूक तंत्र’ पर आधारित यह मेंढक मंदिर अद्वितीय है.
Sunday, August 28, 2011
Thursday, August 18, 2011
Wednesday, August 10, 2011
Wednesday, July 20, 2011
कोणार्क का काला पगोडा और महाबलीपुरम का सप्त पगोडा
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| कोणार्क की नारी प्रतिमा |
- डॉ.शरद सिंह
क्या है ‘पगोडा’ ?
भाषाशास्त्रियों के अनुसार ‘पगोडा’ शब्द संस्कृत के ‘दगोबा’ शब्द का अपभ्रंश रूप है। बर्मी ग्रंथों में पगोडा शब्द का उद्भव लंका की भाषा सिंहल के शब्द ‘डगोबा’ से माना गया है जो मूलतः संस्कृत शब्द है। ‘डगोबा’ का अर्थ है ‘पवित्र अवशेषों की स्थापना का स्थल’। इन्हें ‘स्तूप’ भी कहा गया।
पगोडे पिरामिड आकार के, गुंबदीय अथवा बुर्ज की आकार के बनाए जाते थे।भारत में पगोडे मंदिरों के द्वार पर अथवा मुख्य मूर्तिस्थल के ऊपर बनाए गए।
बौद्ध पगोडे महात्मा बुद्ध तथा बौद्ध धर्म में प्रचलित मान्यताओं के अनुरूप स्मृति-स्थल के रूप में निर्मित हुए जबकि हिन्दू धर्म में हिन्दू मान्यताओं के अनुरूप इन्हें पूजा स्थल अर्थात् मंदिर का रूप मिला।
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| जुआंगझिओ का लौह पगोडा,चीन |
| होरयू-जी मंदिर का पगोडा,जापान |
पगोडा निर्माण की परम्परा भारत से चीन और चीन से जापान होती हुई सुदूर पूर्व में विकसित होती गई। पगोडा संबंधित देशों के स्थानीय स्थापत्य शिल्प में बनाए गए। ये कई मंजिल के और भिन्न आकार के हो सकते थे।
Nice article,madam please tell me why Kornak Temple is called as 'Black Pagoda'? This is a Sun temple,has it shape like Pagoda of south east asia? similar question arise for Sapt Pagoda of Mahabalipuram. (Friday, July 15, 2011 3:00:00 PM) )
कोणार्क का ब्लैक पगोडा
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| कोणार्क का रथमंदिरः काला पगोडा |
रथ-मंदिर के बारह पहिये बारह महीनों के प्रतीक हैं और इसके पहिये की सोलह तीलियां दिन के समय का प्रतीक हैं । इस को पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बहुत ही सुंदर बनाया गया है। संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया है। मंदिर में खजुराहो की तरह मिथुन मुद्राओं वाली मूर्तियां भी हैं।
काले ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित होने के कारण कोणार्क के सूर्य मंदिर को ब्लैक पगोडा भी कहा जाता है।
महाबलीपुरम का सप्त पगोडा
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| महाबलीपुरम के रथ मंदिर अर्थात् सप्त पगोडा |
दक्षिण भारत में महाबलीपुरम अथवा मामल्लपुरम में स्थित
‘सप्त पगोडा’ महाभारत महाकाव्य के पांडव भाइयों के रथों के रूप में निर्मित है। महाबलीपुरम् की वास्तुकला की तीन प्रमुख शैलियों का सम्बंध राजा मामल्य, उनके बेटे नरसिंह वर्मन और राजसिंह के शासन काल से है । महाबलीपुरम् की शैली सबसे प्राचीन और सरल है जो चट्टान को काटकर बनाये गये मंदिरों में पायी जाती है । लगभग 8 वीं तथा उसके बाद नरसिंहवर्मन और राजसिंह काल में ग्रेनाइट पत्थर के शिला-खंडों से मंदिरों का निर्माण किया गया था ।
‘सप्त पगोडा’ महाभारत महाकाव्य के पांडव भाइयों के रथों के रूप में निर्मित है। महाबलीपुरम् की वास्तुकला की तीन प्रमुख शैलियों का सम्बंध राजा मामल्य, उनके बेटे नरसिंह वर्मन और राजसिंह के शासन काल से है । महाबलीपुरम् की शैली सबसे प्राचीन और सरल है जो चट्टान को काटकर बनाये गये मंदिरों में पायी जाती है । लगभग 8 वीं तथा उसके बाद नरसिंहवर्मन और राजसिंह काल में ग्रेनाइट पत्थर के शिला-खंडों से मंदिरों का निर्माण किया गया था ।
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| विष्णु प्रतिमा, मामल्लपुरम |
मामल्ल शैली का विकास नरसिंह वर्मन प्रथम के काल में हुआ। इसके अन्तर्गत रथ मंदिरों का निर्माण किया गया। ये मंदिर मामल्लपुरम में हैं। रथ मंदिर में द्रौपदी रथ सबसे छोटा है। इसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं है। धर्मराज रथ के रथ मंदिर पर नरसिंह वर्मन की मूर्ति अंकित है। ग्रेनाइट पत्थर के पत्थरों से बनाए जाने तथा सात की संख्या में होने के कारण इन रथों को 'सप्त पगोडा' भी कहा जाता है। सप्त पगोडा के अन्तर्गत निम्नलिखित रथ बनें- 'धर्मराज रथ', 'भीम रथ', 'अर्जुन रथ', 'सहदेव' रथ, 'गणेश' रथ, 'वलैयकुट्ई' रथ और 'पीदरी' रथ।
कोणार्क का सूर्य मंदिर अर्थात् ब्लैक पगोडा और महाबलीपुरम का सप्त पगोडा भारतीय शिल्प एवं स्थापत्य कला की कालजयी धरोहर हैं।
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